Tuesday, March 29, 2011

थोड़ा सा बहम रखता हूँ


थोड़ा सा
बहम रखता हूँ
लोगों की
नज़रों से डरता हूँ
मुस्कराते चेहरों से
खौफ खाता हूँ
अब दिन में भी
डरता हूँ
चांदनी झुलसाती
मुझे
ठंडी हवा
लू सी लगती मुझे
जब अपने दुश्मन
समझते मुझे
किसी पर यकीन
 कैसे करूँ ?
निरंतर पीठ पर
खंजर खाए
सीना
कैसे खुला रखूँ
अब चुप रहता हूँ
चुपचाप सहता हूँ
29-03-03
548—218-03-11

No comments: