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Sunday, February 19, 2012

दिहाड़ी मजदूर

महीना गर्म जून का हो
या हो सर्द दिसंबर का
मेला सावन का भरे
या भरे बसंत का
दिहाड़ी मजदूर का
मौसम से क्या लेना देना
उसे के लिए सारे मौसम
इक सार हैं
जीने के लिए रोज़ मरना है
हाथ खुरदरे हो गए
खुद के गालों पर फिराए
तो भी चुभते
बच्चे को प्यार कैसे करे
यह भी सोचना पड़ता
निरंतर
पसीने से नाहना पड़ता
बीमार हो या स्वस्थ
उसे आराम कहाँ
उसे तो परमात्मा के
फैसले का सम्मान
करना पड़ता
हँसते हँसते भाग्य से
लड़ना पड़ता
19-02-2012
195-106-02-12