हमें
सुकून मिल गया
पता नहीं चला
कब ज़ख्म बढ़ गया
जिसे समझा था
सहारा
वो ही हाथ में
खंज़र लिए निकला
हँसते हँसते कर दिया
वार पीठ पर
जिसे चाहा था
दिल से
वही कातिल निकला
18-04-2012
458-39-04-12
निरंतर कुछ सोचता रहे,कुछ करता रहे,कलम के जरिए बात अपने कहता रहे.... (सर्वाधिकार सुरक्षित) ,किसी की भावनाओं को ठेस पहुचाने का कोई प्रयोजन नहीं है,फिर भी किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचे तो क्षमा प्रार्थी हूँ )