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Monday, May 28, 2012

चाहत की इन्तहा




हमारी चाहत की
इन्तहा ही कहिये
वो  रकीब से अकेले में
गुफ्तगू करते रहे
कहीं बदनाम ना
हो जाएँ
कोई देख ना ले
दोनों को
फ़िक्र में हम परेशां
होते रहे
उनके घर के बाहर
चहल कदमी करते रहे
28-05-2012
541-61-05-12

Tuesday, February 21, 2012

आज वो हमें मनाने आये हैं

आज वो
हमें मनाने आये हैं
अपनी बेवफाई की
वजह बताने आये हैं
ज़ख्मों पर
मरहम लगाने आये हैं
समझते हैं
हम उनकी बातों में
आ जायेंगे
अश्क पोंछ कर उनकी
बाहों में झूल जायेंगे
भूल गए 
पहले भी कई बार
वादे किये थे हमसे
हर बार रोता छोड़ गए
हमने भी
तय कर लिया अब
उन्ही के
तीर से उन्हें मारेंगे
हँस कर कह देंगे
थोड़ी सी देर से आये हैं
हम उनके रकीब को
हाँ कर चुके हैं
21-02-2012
212-123-02-12
रकीब = दुश्मन