ना जाने क्यूं उन्हें
हमारी याद नहीं आती
कैसे इतना भी
कोई भूलता किसी को
हमें एक हिचकी भी
नहीं आती
चाहत की सारी बातें
ना जाने
कहाँ गुम हो जाती
एक तिनके सी
हवा में उड़ जाती
यहाँ निरंतर रातों की
नींद हराम होती
वहाँ बेफिक्री से
ज़िन्दगी जी जाती
ना जाने क्यूं उन्हें
हमारी याद नहीं आती
06-11-2011
1747-16-11-11
मुझे मेरे हाल पर
छोड़ दो
बस खतों का जवाब
दे दिया करो
ज़ख्मों पर मरहम
ना लगाओ
देख कर मुस्करा
दिया करो
रिश्ता चाहे ना रखो
मेरे नाम पर आहें
भर लिया करो
मुलाक़ात चाहे ना करो
बस ख़्वाबों में दिख
जाया करो
नज्मों में ज़िक्र चाहे
ना करो
मेरी नज्में निरंतर
पढ़ लिया करो
चाहो याद ना करो
जब याद करूँ
हिचकी ले लिया करो
31-07-2011
1275-159-07-11