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Friday, December 7, 2012

जो देख रहे हैं



जो देख रहे हैं
वह सत्य है या असत्य
यह तो पता नहीं
देखने दिखाने वालों के
मंतव्य का भी पता नहीं
किस का कैसा सोच
अच्छा या बुरा
यह भी पता नहीं  
किसका ईमान से 
किस का
स्वार्थ से भरा हुआ
यह भी पता नहीं
क्यों मन को
व्यथित करते हो
दूसरे जैसे भी देखते
दिखाते हैं
उन्हें वैसे ही देखने
दिखाने दो 
पर खुद तो
इमानदारी से देख लो
जो जैसा भी दिखता है
उसे वैसा मत समझ लो
विवेक और बुद्धि से
काम लो
भेड की खाल में छुपे
भेडियों को पहचान लो
905-23-07-12-2012
देखना,सत्य,असत्य,मंतव्य,विवेक,बुद्धि

Tuesday, June 26, 2012

मेरी आत्मा



शरीर की
कितनी पडतों के
नीचे दबी है मेरी आत्मा
मुझे पता नहीं
शरीर में कहाँ छुपी है
मेरी आत्मा
मुझे पता नहीं
इतना अवश्य पता है
निरंतर कुलबुलाती है
मेरी आत्मा
जब देखती है
बच्चों,स्त्रियों.बढे,बूढों
निरीह जानवरों पर
अत्याचार
रोती है मेरी आत्मा
जब देखती है
दोगलापन,असत्य
अहम्,अहंकार से
भरे लोगों को
कुछ कह तो नहीं पाती
मेरी आत्मा
पर चित्कार अवश्य
करती है
चिल्ला कर कहती है
तुम कभी ऐसा मत करना
जिस दिन
तुमने कुछ ऐसा सोचा भी
मैं तुम्हें
छोड़ कर चली जाऊंगी
फिर तुम्हें भी अमानुष
बन कर जीना पडेगा
जीवन में
कभी चैन नहीं मिलेगा
26-06-2012
598-48-06-12


Saturday, March 3, 2012

सत्य -असत्य

तुम मुझसे
सत्य सुनना चाहते
मेरा सत्य जानना चाहते
पर अपना सत्य
बताना नहीं चाहते
असत्य के आवरण में
अपना सत्य छुपाना चाहते
सत्य की अपेक्षा करना
अगर आवश्यक है
तो तुम्ही बताओ
सामने वाला भी अगर
सत्य की अपेक्षा रखता है
तो गलत कहाँ करता है?
फिर सत्य जानने के लिए
हम क्यों
इतना लालायित रहते ?
तुम कहोगे
मानव स्वभाव है
तो फिर मानव स्वभाव तो
असत्य को सहना भी नहीं है
चाँद को
सूरज तो नहीं कह सकते
मेरे पास तो
उत्तर का अभाव है
तुम्हारे पास
उत्तर का समाधान हो तो
मुझे ही नहीं
सारे जग को बताओ
नहीं तो सत्य की अपेक्षा
करना छोड़ दो
वह भी नहीं हो पाए तो
असत्य को सुनते रहो 
असत्य बोलते रहो 
परमात्मा को पाना है तो
सत्य कहने का
प्रयत्न करना प्रारम्भ करो
इस व्याधि से मुक्ती
मिल जायेगी 
परमात्मा की इच्छा
अनुरूप जी सकोगे
अभी जो भी हम कर रहे हैं
वो हमें परमात्मा से
दूर कर रहा है
03-03-2012
283-18-03-12