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Wednesday, March 13, 2013

अहम् की गांठें



अहम् की गांठें
खुल जाती अगर
रिश्तों की रस्सी के
बल सुलझ जाते
रिश्तों में
पवित्रता आ जाती
अपने पराये ना बनते
सड़क पर चलने वाले
पराये कम
अपने अधिक होते
अपने अपने ही नहीं
ह्रदय के हिस्से होते
24-24-13-01-2013  
अहम्,रिश्ते,
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर  

Tuesday, March 5, 2013

फूलों से ही सीख लो


थोड़ी सी
सफलता मिल गयी
तुम बेकाबू हो गए
ढोल नगाड़े बजाने लगे
खुशी में नाचने लगे
सारी दुनिया को
बढ़ा चढ़ा कर बताने लगे
अपने को सबसे
बेहतर समझने लगे
कभी फूल को
खिलते समय शोर
मचाते देखा
महक फैलाते हुए
नाचते गाते देखा
कुछ तो फूलों से ही
सीख लो
सफलता को
घमंड की सीमा तक
ना जताओ
आगे बढ़ने के रास्ते
बंद मत करो
09-09-03-01-2013
सफलता,अहम्,घमंड,अहंकार
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

Saturday, December 15, 2012

मन रोता सत्य देखने को आज



मन रोता
सत्य देखने को आज
चारों ओर
झूठे बड़बोलों का राज
छा रहा हर मन में
घनघोर अन्धेरा आज
ह्रदय तड़पता
प्रेम की आस में आज
अहम् इर्ष्या का नंगा
नाच हो रहा
इंसान इंसान का
दुश्मन हो गया आज
संबंधों में पड़ गयी दरार
भाई भाई की ले रहा जान
दोस्त बन गया
सबसे बड़ा दुश्मन आज
स्वार्थी हो गया संसार
साज़ बाज़ रहे
बिना सुर के आज
कैसा आया
यह काल प्रभु आज
कैसा आया
यह काल प्रभु आज
950-69-15-12-2012
जीवन,मन,सत्य,सम्बन्ध,अहम्,स्वार्थ,इर्ष्या,द्वेष, अहम्  

ज़िन्दगी जीने की जगह काटनी पड़ रही है



रिश्तों में गर्माहट
ख़त्म हो चुकी है
अब मिलने पर
खोखली हँसी बची है
अपनत्व की बली
चढ़ाई जा चुकी है
अहम् और स्वार्थ की
बन आ पडी है
दिलों में बर्फ जम चुकी है
रंग बिरंगी ज़िन्दगी
अब फीकी पड़ गयी है
ज़िन्दगी जीने की जगह
काटनी पड़ रही है
938-57-15-12-2012
ज़िन्दगी,जीवन,रिश्ते ,अहम्,स्वार्थ,अपनत्व

Saturday, December 8, 2012

तुमने कहा मुझे नहीं भाया



तुमने कहा
मुझे नहीं भाया
मैं नासमझ
तुम समझदार हुए
मैंने कहा
तुम्हें नहीं भाया
मैं समझदार
तुम नासमझ हुए
अहम् टकराता रहा
नतीजा कुछ नहीं
निकला
921-39-08-12-2012
नासमझ,समझदार,अहम्

Tuesday, November 6, 2012

उड़ता जो भी परिंदा आसमान में


उड़ता जो भी परिंदा आसमान में
उड़ता जो भी परिंदा
आसमान में
ज़मीन पर आता  ज़रूर
क्यूं भूल जाता है इंसान मगर
छूता  ऊँचाइयाँ जब भी
दिमाग भी
ऊंचाइयों पर रख देता
अहम् से भर जाता
देखता भी नहीं नीचे के
लोगों को कभी
भूल जाता  अपनों को भी
गले से लगता उनको ही
जो भी मुस्काराता साथ में
करता  झूठी तारीफ़ उसकी
भ्रम की दुनिया में खो जाता
भूल जाता
रहता नहीं समय किसी का
इकसार कभी
इतना भी याद नहीं रखता
जब भी आयेगा ज़मीन पर
मिलेगा नहीं कोई बात
करने वाला भी कभी
829-13-06-11-2012
जीवन,परिंदा,अहम्

अहम् के विस्तार में रिश्ते कहीं खो गए


अहम् के विस्तार में रिश्ते कहीं खो गए
अहम् के विस्तार में
रिश्ते कहीं खो गए
हम और हमारे
नेपथ्य में रह गए
मैं और मेरा
अब गौण हो गए
इंसान हाड मास के
पुतले रह गए
अकेले जीना
मजबूरी हो गया
साथ के नाम पर
अकेलापन रह गया
825-09-06-11-2012
अहम्,अहंकार,संतुष्टी,अकेलापन ,रिश्ते

इंसान बन कर जीना सिखा दे सब को


इंसान बन कर  जीना सिखा दे सब को
हर आदमी
आसमान छूना चाहता
मीनारों से भी
बड़ा बनना चाहता
नीव का पत्थर कोई
नहीं बनना चाहता
धरती पर रह कर भी
इंसान बन कर नहीं
जीना चाहता
स्वर्ग की तलाश में रहता
बिना त्याग तपस्या
खुद को पुजवाना चाहता
गुलाब मोगरे की सुगंध चाहता
पर खुद दुर्गन्ध फैलाता
वृक्ष की छाया लेना चाहता
देने में कंजूसी करता
परमात्मा कुछ दे ना दे
इंसान को
बस सद्बुद्धि दे दे सबको
बरगद सा ह्रदय,
गुलाब की महक
से भर दे हर जीवन को
इंसान बन कर
जीना सिखा दे सब को
824-08-06-11-2012
अहम्,अहंकार,इच्छाएं,जीवन,संतुष्टी,परमात्मा

Sunday, October 28, 2012

राजा है या फ़कीर



सड़क पर चलने वाला
राजा है या फ़कीर
पेड़ को फर्क नहीं पड़ता
जो भी बैठता उसके नीचे
उसे ही छाया दे देता
ना घमंड ना अहंकार उसे
निरंतर
हवा में लहराता रहता
पक्षी छोटा हो या बड़ा
उसे अंतर नहीं पड़ता
जो भी बनाता घोंसला
ड़ाल पर
उसे ही बसेरा बसाने देता
इंसान देखता भी सब है
समझता भी सब है
अहम् उसे इंसान
बनाए नहीं रखता
सदियों से लुटता रहा है
अहम् में
लुटना फिर भी नहीं
छोड़ता
कहलाता इंसान
हैवान बनना
फिर भी नहीं छोड़ता
थोड़ा सा भी पेड़ से
सीख लेता
भगवान् तो नहीं
इंसान बन कर तो
जी लेता
814-56-28-10-2012
घमंड,अहंकार,अहम्,स्वार्थ,जीवन ,ज़िन्दगी

अहम् का प्रश्न



समंदर का
पानी खारा होता है
तो क्या हुआ
मछलियों को तो मीठा 
लगता
उनके जीवन का सहारा होता
ये आवश्यक तो नहीं
जो तुम्हारे लिए अच्छा
वो दूसरों के लिए भी
अच्छा हो
जो तुम्हें भाये वही
दूसरों को भी भाये
फिर क्यों चाहता है मनुष्य
सब उसकी चाहत को चाहें
उसे अहम् का प्रश्न बनाए
जो ना माने उसे नापसंद करे
812-54-28-10-2012
चाहत,जीवन,अहम्,पसंद,नापसंद,

Tuesday, August 21, 2012

अहम् पर कविता -हार किसी को मंज़ूर नहीं



चार दिनों का
सब्र भी नहीं किसी को
पल पल भारी लगता
जीवन का
जब अहम् हो गया
जान से प्यारा 
क्या करना फिर
दोस्त और दोस्ती का
जो भी
रह गया होड़ में पीछे
वही हारा कहलाता
हार किसी को मंज़ूर नहीं
क्या अपना क्या पराया
प्यार मोहब्बत गए भाड़ में
हर इंसान
फिर दुश्मन लगता
21-08-2012
673-33-08-12,

Friday, August 3, 2012

ना तुम्हारी जीत ज़रूरी ,ना मेरी हार ज़रूरी



ना तुम्हारी जीत ज़रूरी
ना मेरी हार ज़रूरी
दिलों में नज़दीकी ज़रूरी
मैं हार भी जाऊं
पर दिल से नहीं लगाऊँ
तुम जीत भी जाओ
गर सर पर ना चढाओ
अहम् से ना भर जाओ
दिल आपस में वैसे ही
मिलते रहेंगे
ना इक दूजे से यकीन
उठेगा
ना दिलों में फासला बढेगा
मुझे हार में भी जीत का
मज़ा मिलेगा
तुम जीत कर भी
दिल हार जाओगे
03-08-2012
649-09-08-12

Tuesday, June 26, 2012

मेरी आत्मा



शरीर की
कितनी पडतों के
नीचे दबी है मेरी आत्मा
मुझे पता नहीं
शरीर में कहाँ छुपी है
मेरी आत्मा
मुझे पता नहीं
इतना अवश्य पता है
निरंतर कुलबुलाती है
मेरी आत्मा
जब देखती है
बच्चों,स्त्रियों.बढे,बूढों
निरीह जानवरों पर
अत्याचार
रोती है मेरी आत्मा
जब देखती है
दोगलापन,असत्य
अहम्,अहंकार से
भरे लोगों को
कुछ कह तो नहीं पाती
मेरी आत्मा
पर चित्कार अवश्य
करती है
चिल्ला कर कहती है
तुम कभी ऐसा मत करना
जिस दिन
तुमने कुछ ऐसा सोचा भी
मैं तुम्हें
छोड़ कर चली जाऊंगी
फिर तुम्हें भी अमानुष
बन कर जीना पडेगा
जीवन में
कभी चैन नहीं मिलेगा
26-06-2012
598-48-06-12


Saturday, June 2, 2012

घर की खामोशी



घर की खामोशी
हर पल दिल को
चीरने लगी
आपस में कलह
साफ़
दिखने लगी
सुबह को ही शाम
होने लगी
एक दूसरे पर ऊंगली
उठने लगी
प्रेम पर नफरत
हावी होने लगी
अहम् की जीत
हो गयी
अहम् ने
सत्ता हाथ में ले ली
परिवार के बिखरने की
रिश्तों के टूटने की 
शुरुआत हो गयी
02-06-2012
554-74-05-12

Sunday, March 11, 2012

परिस्थितियों के अनुसार

ना सूरज का
पूरब से निकलना
बदलता
ना पश्चिम में ढलना
बदलता
बदलना पड़ता तो
मनुष्य को बदलना पड़ता
परिस्थितियों के अनुसार
ढलना पड़ता
समय के सामने झुकना
पड़ता
जो समझ गया इस
बात को
उसका जीवन सरल
हो जाता
जो नहीं समझता
निरंतर हठ करता रहता
अहम् अहंकार को नहीं
छोड़ता
अपनी जिद पर अड़ा
रहता
जीवन भर ना सफल होता
ना चैन पाता
अंत तक व्यथित रहता
11-03-2012
348-81-03-12

Tuesday, January 17, 2012

वो मुझसे नाराज ,मैं उससे नाराज

वो मुझसे नाराज
मैं उससे नाराज
वो मुझे माफ़ कर दें
तो मैं उसे माफ़ कर दूं
आपस में सुलह हो
जायेगी
नाराजगी आसानी से
ख़त्म हो जायेगी
अब पहल कौन करे
झगडा इस बात  पर था
उलझन को सुलझाने लिए
मध्यस्थ ढूँढने लगे
जिसके लिए मैं कहता
वो नहीं मानता
जिसके लिए वो कहता
मैं नहीं मानता
नाराजगी पहले से
अधिक बढ़ गयी
दोनों के बीच दूरियां भी
अधिक हो गयी
समय गुजरता गया
ना मुझको चैन मिला
ना उसको चैन मिला
समय के साथ दोनों को
समझ आ गया
रिश्तों के बीच "मैं"
आ गया था
अहम् ने मष्तिष्क पर
पर्दा डाल दिया था
कारणवश झगडा सुलझ
नहीं रहा था
आत्मचिंतन किया
उसके घर की ओर
बढ़ चला
वो मेरे घर की ओर
आ रहा था
रास्ते में दोनों का
मिलना हुआ
गिला शिकवा दूर
हो गया
दोस्ती का नया दौर
शुरू हो गया
अहम् का नुकसान
पता चल गया
47-47-01-12