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Tuesday, March 5, 2013

फूलों से ही सीख लो


थोड़ी सी
सफलता मिल गयी
तुम बेकाबू हो गए
ढोल नगाड़े बजाने लगे
खुशी में नाचने लगे
सारी दुनिया को
बढ़ा चढ़ा कर बताने लगे
अपने को सबसे
बेहतर समझने लगे
कभी फूल को
खिलते समय शोर
मचाते देखा
महक फैलाते हुए
नाचते गाते देखा
कुछ तो फूलों से ही
सीख लो
सफलता को
घमंड की सीमा तक
ना जताओ
आगे बढ़ने के रास्ते
बंद मत करो
09-09-03-01-2013
सफलता,अहम्,घमंड,अहंकार
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

Tuesday, December 11, 2012

कौन मरना चाहता है?



कौन मरना चाहता है?
मौत फिर भी आती है
कौन असफलता चाहता है ?
फिर भी हर बार
सफलता नहीं मिलती
यही है मर्म जीवन का
जिसने जान लिया 
उसका जीवन सरल
हो जाता है
जो नहीं जान सका
वो जीवन भर बेचैन
रहता है
928-46-12-12-2012
जीवन ,जीवन मर्म,सफलता,असफलता

Wednesday, September 19, 2012

छोटी सी कामयाबी पर



हमारी
छोटी सी कामयाबी पर
इतनी पीठ थपथपाई गयी
पीठ दर्द करने लगी
कामयाबी सर पर
चढ़ गयी
अपने आप को बड़े भारी
हूनर मंद समझने लगे
थोड़ी सी कामयाबी में
मदहोश हो गए
भूल गए
आगे बढ़ने के लिए
लक्ष्य को
याद रखना होता
मेह्नत से मुंह ना
मोड़ना होता
नतीजा वही हुआ
जो होना था
होश में आये तो देखा
हम चौराहे पर खड़े थे
लोग आगे बढ़ गए
हम वहीं खड़े रह गए
735-31-19-09-12

Saturday, September 1, 2012

प्रतीक्षा में



अनमने भाव लिए
नदी किनारे कदम्ब के
पेड़ के नीचे बैठी
विचारों के जाल में उलझी थी
ऊपर गगन में काले बादलों की
गडगडाहट
उधर मन में विचारों का द्वन्द
उसकी व्यथा को बढ़ा रहे थे
नदी त्वरित गति से बह रही
पथ में आने वाली हर वस्तु को
अपने साथ बहा कर ले जा रही
नदी के पानी की भाँती
 विचार भी त्वरित गति से
आ जा रहे थे
मन में ढेरों आशंकाएं उसकी
आकांशाओं को निराशा में
बदल रही थी
प्रियतम से मिले महीनों
हो गए
बार बार के वादों के बाद भी
नहीं आये
हर बार नए बहाने का
सन्देश अवश्य आया
अब प्रतीक्षारत थी
 कब नदी के पानी की धारा
मंद पड़ेगी
आकाश से काले बादल
विदा होंगे
नीले गगन के दर्शन होंगे
सूरज फिर चमकने लगेगा
तब उसकी प्रतीक्षा की
घड़ियाँ भी समाप्त होंगी
उसके मन के आकाश में
आशाओं का सूरज चमकेगा
उसका प्रियतम से मिलन होगा
निराशा के काले बादलों से
छुटकारा मिलेगा
01-09-2012
706-02-09-12

जब भी चढ़ जाती है,कामयाबी सर पर




जब भी चढ़ जाती है
कामयाबी सर पर
अपने भी पराये लगते हैं
जो भी करे तारीफ़
वही अच्छे लगते हैं
कामयाबी के गरूर में
भूल जाता इंसान
सच्ची बात कहने वाले ही
अपने होते हैं
जब तक रहती है
कामयाबी
मीठी बातों से लुभाने वाले
तब तक ही साथ
रहते हैं
01-09-2012
705-01-09-12


Saturday, March 10, 2012

नन्ही चिड़िया ने पंख फैलाए

नन्ही चिड़िया ने पंख
फैलाए
उमंग उत्साह से उड़ चली
आकाश को नापने 
पहुँच गयी ऊंचे पर्वत
के पास
बार बार प्रयत्न किया 
सफलता से दूर रही
पार ना कर सकी पर्वत को
थक हार मुंह लटका कर
लौट आयी
फिर माँ के पास
हार से व्यथित
करने लगी शिकायत माँ से
क्यों नहीं सिखाया उसने 
पर्वत को पार करने
का राज़
माँ मुस्कारा कर बोली
सब्र और संयम रखो
पर्वत भी पार करोगी
एक दिन
थोड़ी शक्ति और संजो लो
ठीक से उड़ना सीख लो
फिर पर्वत को पार करो
सफलता
कदम अवश्य चूमेगी
पर्वत को पार करने की
इच्छा एक दिन
अवश्य पूरी होगी
10-03-2012
335-69-03-12

Saturday, February 18, 2012

सफलता केवल चाहने से नहीं मिलती

सफलता केवल
चाहने से नहीं मिलती
कर्म के साथ मेहनत भी
आवश्यक होती
सफलता ना मिले तो
सब्र भी रखनी होती
असफलता का दोष
दूसरों पर डालने की
प्रवत्ती घातक होती
स्वयं भी
आत्म मंथन करो
गुरओं और बड़ों से
मार्गदर्शन लो
कारण जानने का
प्रयत्न करो
एक बात और समझ लो
नाकाम ही देते हैं दोष
दूसरों को
रोते रहने से असफल
कभी सफल नहीं होते
जो सफल हुए 
उनसे भी सीख लो
प्रयत्न करते रहो 
हिम्मत होंसले से 
लड़ते रहो
ना हताश हो 
ना निराश हो
निरंतर हँसते हुए
आगे बढ़ते रहो
सफलता एक दिन
कदम चूमेगी
चेहरे पर आजीवन
मुस्काराहट रहेगी
18-02-2012
189-100-02-12

Wednesday, September 14, 2011

संतुष्टी जीवन का मूल मन्त्र

मूल मन्त्र 
इच्छाएँ रखना भी
आवश्यक 
नियंत्रण उन पर
अत्यावश्यक
बिना कर्म के कुछ नहीं
मिलता
सफलता मिलना
निश्चित ना होता
हिम्मत फिर भी नहीं
हारना 
म्रदु व्यवहार सबको
भाता
अभिमान मनुष्य का
नाश करता
क्रोध जीवन को
भस्म करता
स्वार्थ सुख नाशक
होता
दुखों को बुलावा देता  
दिनचर्या के नियम
बनाओ
व्यवहार में अपने
संयम लाओ
होड़ अपने से दूर
भगाओ 
 सदाचार से जीना सीखो
धन बिना काम नहीं
चलता
भविष्य का भी ध्यान करो
आवश्यकतानुसार
संचय करो
येन केन प्रकारेण
ना संचय करो
निरंतर इश्वर का
नमन करो
छोटों को प्यार
बड़ो का सम्मान
करो
खुल कर हंसा करो
कम से कम रोया करो
समय सदा
इकसार नहीं रहता
ये बात भी जान लो
  दर्द जीवन में आयेंगे
दर्द सहना सीख लो
14-09-2011
1502-74-09-11

Sunday, July 24, 2011

ज़िन्दगी फ़ुटबाल का खेल

ज़िन्दगी

फ़ुटबाल का खेल

गेंद कभी इधर

कभी उधर रहती

कभी चोट खाते

कभी

ज़मीन पर गिरते

कभी गेंद गोल में

कभी गोल के बाहर

रहती

कभी विपक्षी भारी

कभी हम भारी

निरंतर

गम और खुशी साथ

चलती रहती

ध्यान

जिसका गेंद पर

वह जीतता

ध्यान हटाने वाला

निरंतर हारता

जीत के लिए खेलना

ज़रूरी

हार जीत खेलने से

होती

बिना खेले ज़िन्दगी

अधूरी रहती

24-07-2011

1222-102-07-11