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Thursday, April 19, 2012

तुम्हें रोज़ याद कर लेता हूँ


वही चढ़ाता है फूल
जलाता है बाती
भगवान् के मंदिर में
करता है दुआएं
माँगता है कृपा उसकी
किसे दे किसे ना दे
सब उसकी
इच्छा पर निर्भर
भक्त का काम
निरंतर उसका नमन
यही सोच तुम्हें रोज़
याद कर लेता हूँ
कब होगी
तुम्हारी कृपा मुझ पर
इंतज़ार में रोज़
तुम्हें ख़त लिख देता हूँ
जिस दिन
मिल जाएगा उत्तर
तुमसे पा लिया प्रसाद
उस दिन तुम्हारी
कृपा समझ  लूंगा
19-04-2012
462-43-04-12

Thursday, March 8, 2012

अब जवाब लेकर जायेंगे

इंतज़ार करते करते 
आजिज़ आ गए
अब दिल की हसरतों को 
इज़हार करने 
हम उनके दर पर आये हैं 
दिल धड़क रहा 
मन घबरा रहा
वो दिल में बसते हमारे
हम अनजान उनके लिए
फिर भी हिम्मत कर के 
उम्मीदों की बरात लेकर 
आये हैं
या तो वो इल्तजा कबूल 
कर लेंगे
या खाली हाथ लौटा देंगे
हम भी या तो दीवाली
मनाएंगे 
या ख्वाइशों की होली 
जलाएंगे 
अब और इंतज़ार नहीं 
करेंगे 
हर हाल में अब जवाब 
लेकर जायेंगे 
08-03-2012
330-64-03-12

Friday, February 10, 2012

क्या ख़ाक बयाँ करूँ

क्या ख़ाक बयाँ करूँ
कैसे बीतता है वक़्त
इंतज़ार में
समझता है वही
जो गुजरा है उस
मुकाम से
की नहीं मोहब्बत
जिसने
कभी लगी नहीं आग
जिसके दिल में
देखे नहीं ख्वाब जिसने
रात में
वो क्या ख़ाक समझेगा
हाल-ऐ-दिल इंतज़ार में
10-02-2012
138-49-02-12

Monday, October 3, 2011

इंतज़ार

दरख्तों के लम्बे
सायों के बीच
शाम के धुंधलके में
वो आज फिर उसके
इंतज़ार में खडी थी
आँखें रोज़ की तरह
सड़क पर गढ़ाए बेचैनी में
ऊंगलियों से खेल रही थी
वक़्त गुजरता जा रहा था
शाम गहराने लगी
चेहरे पर चिंता की लकीरें
बढ़ती जा रही थी
उसका पता ना था
आँखों से आँसू निकलते
उस से पहले ही
दूर एक धुंधली परछायी
नज़र आने लगी 
उम्मीद में
कदम खुद-ब-खुद
उस तरफ बढ़ चले
नज़दीक पहुँचने पर
उसकी
सूरत साफ़ दिखने लगी 
वो खून से लथपथ था
पास आता,
गले मिलता,कुछ कहता
उस से पहले ही
ज़मीन पर ढेर हो गया
उसका इंतज़ार
कभी ख़त्म ना हुआ
आज भी
शाम के धुंधलके में
दरख्तों के
लम्बे सायों के बीच
वो ऊंगलियों से
खेलते खडी दिखती है
चेहरे पर 
उससे मिलने की
उम्मीद अब भी
साफ़ झलकती है
03-10-2011
1600-09-10-11

Tuesday, September 27, 2011

मोहब्बत में साए भी लुभाते

करो कितनी भी
इल्तजा
बुलाने से  लोग 
नहीं  आते
दिल में हो
गर मोहब्बत तो
अपने आप
खिचे चले आते
दूरियों से कभी
नहीं घबराते
दूर हो कर भी
दिल में
समा जाते 
इरादा जहन में
अगर पाक हो
जिनसे पहले कभी
मिले नहीं
वो भी दिल को
लुभाते 
चुपके से अपने
बन जाते
मोहब्बत में
साए भी लुभाते
निरंतर इंतज़ार
वो भी कराते
27-09-2011
1566-136709-11

Thursday, September 22, 2011

टूटे हुए मंज़र

दिन भर निरंतर
उनके इंतज़ार में
डूबे रहते
आँखों में हसरत के
टूटे हुए मंज़र होते
शाम तक बुझे हुए
चिराग सा दिखते
ग़मों के बोझ
सोने भी ना देते
रात भर सुबह का
इंतज़ार करते
ज़िन्दगी
निरंतर यूँ ही
तमाम करते
22-09-2011
1542-113-09-11

Wednesday, September 21, 2011

ना जाने कौन सा इम्तहान लेते हैं ?

बहुत तड़पाते
निरंतर
इंतज़ार कराते
वक़्त की सुइयों को
ठहरा देते
बादल सा कड़कते
मगर खुल कर
बरसते नहीं
ना जाने किस बात की
सज़ा देते हैं
वो कमज़ोरी हमारी
ये भी वो जानते हैं
उनके बिना
हम रह ना पाते
ना जाने कौन सा
इम्तहान लेते हैं ?
क्यूं रुला रुला के
हँसाते हैं ?
21-09-2011
1535-106-09-11