ठोकर ना मारो
इस तरह नफरत
ना करो
कभी निरंतर
महकता था
भंवरों को लुभाता था
गुलशन की शान
बढाता था
वक़्त की मार से
झुलस गया है
वक़्त ने कब किसे
छोड़ा है
वक़्त तुम्हारा भी
बदलेगा
इक दिन तुम्हें भी
मुरझाना होगा
उस वक़्त का अहसास
कर लो
थोड़ी सी इज्ज़त
बक्श दो
थोड़ा सा प्यार दे दो
मिट्टी में दफना दो
01-09-2011
1430-05-09-11
गुजरा वक़्त
एक महकता गुलशन
अनगिनत
सुन्दर फूलों से भरा
आँखों को आराम
दिल को सुकून देता
जी निरंतर चाहता
गुलशन में बैठा रहूँ
फूलों की महक ज़ज्ब
करता रहूँ
आज से दूर भाग जाऊं
बदले वक़्त की कडवी
हकीकत को भूल जाऊं
इसी तरह खुद को
खुश रखूँ
08-08-2011
1319-41-08-11
ये ना समझना
तुम्हें याद नहीं करता
निरंतर तुम्हें चाहा
दिल तुमसे लगाया
खुद के लगाए
गुलशन को
उजाड़ नहीं सकता
गुल कहीं भी खिले
उसे मुरझाते
देख नहीं सकता
ये बात जुदा है
अब इज़हार नहीं
करता
19-07-2011
1206-86-07-11