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Thursday, September 1, 2011

मुरझाये फूल को ठोकर ना मारो

ठोकर ना मारो
इस तरह नफरत
ना करो
कभी निरंतर
महकता था
भंवरों को लुभाता था
गुलशन की शान
बढाता था
वक़्त की मार से
झुलस गया है
वक़्त ने कब किसे
छोड़ा है
वक़्त तुम्हारा भी
बदलेगा
इक दिन तुम्हें भी
मुरझाना होगा
उस वक़्त का अहसास
कर लो
थोड़ी सी इज्ज़त
बक्श  दो
थोड़ा सा प्यार दे दो
मिट्टी में दफना दो
01-09-2011
1430-05-09-11

Monday, August 8, 2011

गुजरा वक़्त एक महकता गुलशन

गुजरा वक़्त

एक महकता गुलशन

अनगिनत

सुन्दर फूलों से भरा

आँखों को आराम

दिल को सुकून देता

जी निरंतर चाहता

गुलशन में बैठा रहूँ

फूलों की महक ज़ज्ब

करता रहूँ

आज से दूर भाग जाऊं

बदले वक़्त की कडवी

हकीकत को भूल जाऊं

इसी तरह खुद को

खुश रखूँ
08-08-2011

1319-41-08-11

Tuesday, July 19, 2011

अब इज़हार नहीं करता

ये ना समझना
तुम्हें याद नहीं करता
निरंतर तुम्हें चाहा
दिल तुमसे लगाया
खुद के लगाए
गुलशन को
उजाड़ नहीं सकता
गुल कहीं भी खिले
उसे मुरझाते 
देख नहीं सकता 
ये बात जुदा है
अब इज़हार नहीं
करता
19-07-2011
1206-86-07-11