मेरी तमन्ना है
कोई तमन्ना ही नहीं रखूँ
ये पूरी हो जाए
तो नयी तमन्ना क्यों रखूँ
तमन्ना का क्या
रोज़ उठती रोज़ मरती है
एक पूरी हो जायेगी
तो दूसरी सर उठायेगी
सुकून से जीना है
तो लगाम कसनी पड़ेगी
उठने से पहले हमेशा के लिए
दबानी पड़ेगी
839-23-11-11-2012
शायरी,तमन्ना