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Tuesday, July 17, 2012

अब अपने आप से नफरत करने लगा हूँ


अब अपने आप से
नफरत करने लगा हूँ
जो नहीं कहना चाहिए
कह देता हूँ
जो नहीं सुनना चाहिए
सुन लेता हूँ
दिल के हाथो कमज़ोर
हो जाता हूँ
हर बार खुद को बेबस
सिला
उम्मीद से उलटा
पाता हूँ
लोगों की नज़रों से
उतर जाता हूँ
अब सोच रहा हूँ
दिल की सुनना छोड़ दूं
दिमाग से काम लूं
चेहरे पर चेहरा चढ़ा लूं
हर बात को तोल कर बोलूँ
लोगों को खुश कर दूं
उन्हें झूठा सुकून दे दूं
17-07-2012
610-07-07-12


Thursday, March 31, 2011

पहल कौन करे?


दोंनों ट्रेन में
आमने सामने बैठे थे
रह रह कर
एक दूसरे को देखते थे
चेहरे इक दूजे को
जाने पहचाने लगते 
कभी कनखियों से,
कभी नज़रें मिला कर
कहाँ देखा? 
याद करने की कोशिश 
करते रहे
दिमाग पर जोर डालते रहे ,
कौन पहल करे,सोचते रहे
स्टेशन आया
एक की यात्रा पूरी हुयी
जिज्ञासा ख़त्म ना हुयी
भाग कर डब्बे पर लगी
आरक्षण सूची पढी तो
उस सीट पर बैठे शख्श का
नाम पता पडा
याद आया पुराना मित्र था
स्कूल में साथ पढता था
आज चालीस वर्ष बाद
देखना हुआ
मिलने की इच्छा में भाग कर
डब्बे में चढ़ने के कोशिश करी ,
पर ट्रेन गति पकड़ चुकी थी
मिलने की इच्छा अधूरी रह गयी
झिझक और पहल कौन करे?
 के अहम् ने
आज मित्र से मिलने का
सुनहरी अवसर गवां दिया
अब पछता रहा था 
इंसान निरंतर अहम् में
खोता रहा
सिवा झूठी संतुष्टि किसी को
आज तक कुछ ना मिला
31-03-03
560—230-03-11

दिल और दिमाग में झगडा हुआ,दिमाग बोला दिल से,तुझे क्या चाहिए


  दिल  
और दिमाग में
झगडा हुआ
दिमाग बोला दिल से
तुझे क्या चाहिए
दिल ने जवाब दिया
सुकून दिमाग में  चाहिए
दिमाग बोला
अपने पर काबू रखा करो
ज्यादा  ना मचला करो
दिल बोला तुम्ही रास्ता
दिखाते हो
ज्यादा सोचते हो
परेशान खुद होते हो
निरंतर परेशाँ मुझे भी
करते हो
में तो दिल हूँ
दिल से दिल लगाता हूँ
अपने आप से मजबूर हूँ
दरवाज़ा खुला रखता हूँ
जो भी आ जाए
प्यार से उसे
रखता हूँ
06-11-2010