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Tuesday, August 21, 2012

कहना कुछ और चाहता हूँ ,समझा कुछ और जाता है



हमारी हर बात में
शायद एक हर्फ़
कम रह जाता है
बात का मतलब ही
बदल जाता है
तकलीफ का सबब
बन जाता है
कैसे समझाऊँ ?
खुद को बेगुनाह बताऊँ
कहना कुछ और
चाहता हूँ
समझा कुछ और
जाता है
21-08-2012
682-42-08-12


Wednesday, November 30, 2011

बेगुनाह को गुनाहगार करार देते हैं


वादा कर के भी
वो नहीं आये
हमने सोचा नाराज़
हो गए
हम मन में कुढ़ते रहे
निरंतर
हकीकत जाने बिना
कयास लगाते रहे
उन्हें
भला बुरा कहते रहे
शर्म से गढ़ गए
जब पता चला
वो हादसे में घायल
हो गए थे
अस्पताल में
मौत से लड़ रहे थे
अब सोचते हैं
क्यों इंसान
हकीकत जाने बिना
अंदाज से 
ख्याल बनाते हैं
बेगुनाह को 
गुनाहगार करार 
देते हैं
30-11-2011
1830-95-11-11