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Wednesday, October 24, 2012

क्या खता इतनी बड़ी थी



क्या खता इतनी
बड़ी थी
क़त्ल किया नहीं 
सजा क़त्ल की दे दी
हमें इल्म नहीं था
शक क़त्ल से भी
बड़ा गुनाह होता
हमने तो छोटी बहन
समझ कर कहा था
हम तुम्हें चाहते हैं
तुमने इज़हार-ऐ-इश्क
समझ लिया
बिना सोचे समझे
गुनाहगार करार दे दिया
रिश्तों से ऐतबार ही
उठा दिया
783-26-24-10-2012
गुनाहगार,रिश्तों, गुनाह 

Saturday, September 1, 2012

अब फिर ज़ख्म खाने का मन करता



अब फिर ज़ख्म खाने का
मन करता
उनसे मिलने का दिल
करता
मिलेंगे तो हम पर तोहमत
लगायेंगे
हमें गुनाहगार करार देंगे
शहर भर में रुसवा करेंगे
हमें तो
आदत है ज़ख्म खाने की
चुपचाप दर्द सहने की
हमें गम नहीं होगा उनके
नफरत भरे अंदाज़ का
इस बहाने उन्हें देख तो लेंगे
कुछ अरसे
उनके ज़हन में तो रहेंगे
01-09-2012
707-03-09-12

Tuesday, June 5, 2012

खामोशी से सहना भी गुनाह होता



मुझे चोट लगी
मैं चुप रहा
मेरा दिल टूटा
मैंने कुछ नहीं कहा
मुझ पर पत्थर
फैंके गए
मैं हँसना रहा
मुझ पर इलज़ाम
लगाए गए
मैंने जवाब नहीं दिया
लोगों ने समझा
मैं गुनाहगार हूँ
पता नहीं था
खामोशी से सहना
भी गुनाह होता
इमानदारी से जीना
इतना दुश्वार होता
05-06-2012
570-20-06-12

Monday, April 30, 2012

गुनाहगार


बहुत तमन्ना थी
उन्हें दुल्हन बना कर
घर लाऊँगा
अपने आशियाने को
ज़न्नत बनाऊंगा
नहीं पसंद किया
खुदा ने मेरे इरादे को
उसे दुल्हन का जोड़ा
पहना दिया
मेरे भी सेहरा बंधवा दिया
निकाह से पहले ही उसे
अपने पास बुला लिया
घर की बजाए
कब्रिस्तान को ज़न्नत
बना दिया
  ना जाने क्यूं
मेरा सुकून खुदा से
देखा ना गया
कुछ कहा तो नहीं
अपनी जुबां से खुदा ने
उन्हें ज़मीन से उठा कर
तमन्ना रखने का
गुनाहगार करार
दिया
27-04-2012
478-59-04-12

Sunday, March 18, 2012

क्यूं भूल जाते ?

उन इल्जामों का कोई
वजूद नहीं
जो हम पर लगाए जाते  ,
गुनाहगार करार देने
के लिए
रोज़ नए किस्से बनाए
जाते
बातों के तीर चलाये
जाते
हम डर कर टूट जाएँ
थक कर झुक जाएँ
घबरा कर उनकी बात
मान लें
समझ नहीं आता हमको
वो क्यूं भूल जाते ?
हमने ही सिखाया था
उनको
कैसे हालात से लड़ा
जाए
चाहे कुछ भी हो जाए
काले को काला सफ़ेद को
सफ़ेद कहें
चाहत को कमजोरी
समझने की भूल कोई
ना करें
18-03-2012
403-137-03-12

Wednesday, November 30, 2011

बेगुनाह को गुनाहगार करार देते हैं


वादा कर के भी
वो नहीं आये
हमने सोचा नाराज़
हो गए
हम मन में कुढ़ते रहे
निरंतर
हकीकत जाने बिना
कयास लगाते रहे
उन्हें
भला बुरा कहते रहे
शर्म से गढ़ गए
जब पता चला
वो हादसे में घायल
हो गए थे
अस्पताल में
मौत से लड़ रहे थे
अब सोचते हैं
क्यों इंसान
हकीकत जाने बिना
अंदाज से 
ख्याल बनाते हैं
बेगुनाह को 
गुनाहगार करार 
देते हैं
30-11-2011
1830-95-11-11

Sunday, July 17, 2011

जब मुंसिफ ही कातिल हो गए,फैसला क्या ख़ाक करेंगे


आवाम का माल
जब जेब में रखेंगे
चोरों को
क्या ख़ाक पकड़ेंगे  
वोट के खातिर
मजहब की सियासत
करेंगे
आवाम का ख्याल
क्या ख़ाक रखेंगे
निरंतर गद्दारों को
जब माफ़ करेंगे
मुल्क का ख्याल
क्या ख़ाक रखेंगे
कातिल हो गए
फैसला
क्या ख़ाक करेंगे
गुनाहगार बाहर होंगे
बेगुनाह सज़ा पाते
रहेंगे
17-07-2011
1196-76-07-11
(मुंसिफ=फैसला करने वाला,सियासत =राजनीति ,आवाम =जनता)