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Sunday, March 31, 2013

दिन ढल गया रात भी धोखा दे गयी



दिन ढल गया
रात भी धोखा दे गयी
उससे सपनों में
मिलने की इच्छा भी
पूरी ना हुयी
ह्रदय को ऐसे दर्द की
आदत नहीं है
जीना है अगर
हर अनहोनी के लिए
तैयारी करनी पड़ेगी
हार सहने की आदत भी
डालनी होगी
दर्द सहते सहते भी 
आँखों की
नमी सुखानी होगी
बेमन से ही सही
चेहरे पर हँसी भी
रखनी होगी
56-56-30-01-2013
जीवन,आदत,सहना, 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

Thursday, July 5, 2012

खामोश रहो



खामोश रहो
कुछ मत बोलो
अपने गम अपने तक
रख लो
ना विरोध करो ना
प्रतिरोध करो
कोई कुछ कहे
चुपचाप सुन लो
ना व्यथित हो
ना आंसू बहाओ
पहले भी
तुमने विरोध किया
क्या नतीजा निकला ?
क्या सिला मिला ? 
बचा खुचा विश्वास खोया
खुद को चौराहे पर
खडा पाया
किधर जाना है?
पता नहीं था
क्यों भूल गए?
बहुत मुश्किल से खुद को
सम्हाला था
क्या बार बार ऐसा ही
चाहते हो
कब तक लड़ोगे
लोगों को बदलने की
कोशिश करोगे
बार बार हारोगे
खुद के अस्तित्व को
खतरे में डालोगे
क्यों ना समर्पण कर दो?
सबकी इच्छा का पालन
कर लो
 नाराजगी दूर कर दो
प्रभु में विश्वास रखते हो
तो उस पर छोड़ दो
वो जैसा चाहता है
वैसा ही होगा
लड़ोगे तो भी
नहीं लड़ोगे तो भी
तुम कर्म करते रहो
ईमान से जीते रहो
सब्र से सहते रहो
अब समय आ गया है
भाग्य पर छोड़ दो
जो भाग्य में लिखा है
हो जाएगा
नहीं चाहोगे तो भी
चाहोगे तो भी
05-07-2012
604-01-07-12

Tuesday, June 5, 2012

खामोशी से सहना भी गुनाह होता



मुझे चोट लगी
मैं चुप रहा
मेरा दिल टूटा
मैंने कुछ नहीं कहा
मुझ पर पत्थर
फैंके गए
मैं हँसना रहा
मुझ पर इलज़ाम
लगाए गए
मैंने जवाब नहीं दिया
लोगों ने समझा
मैं गुनाहगार हूँ
पता नहीं था
खामोशी से सहना
भी गुनाह होता
इमानदारी से जीना
इतना दुश्वार होता
05-06-2012
570-20-06-12

Saturday, December 31, 2011

क्षणिकाएं -12


मैं हारा

मैं हारा
तो क्यों हारा
दूसरा जीता
तो क्यों जीता
माँ
माँ
की नहीं मानते
माँ के लाल
माँ फिर भी
उनके लिए बेहाल
मन-दिल
मन बूढा नहीं
होता
सोच हो जाता है
दिल बूढा नहीं
होता
इकरार का तरीका
बदल जाता है
मन मिलना
या तो वो थोड़े
बड़े होते
या मैं थोड़ा
छोटा होता
फिर भी क्या पता ?
मन मिलते या
ना मिलते
मुश्किल
कहना भी मुश्किल
चुप रहना भी
मुश्किल
सहना भी मुश्किल
जीना भी मुश्किल
मुलाक़ात
उनसे
मुलाक़ात तो हुयी
मगर
बात नहीं हुयी
नींद ज़रूर
हराम हो गयी
बैठे ठाले जान की
आफत हो गयी
"मैं "
दबी हुयी कुंठा की
अभिव्यक्ती
मन की पीड़ा
बहुतों को चाहता हूँ
कहते हुए डरता हूँ
सलाह
सलाह देने का
शौक सबको
लेना पसंद नहीं
किसीको
जब सहना ही है
जब सहना ही है
तो रोना क्यों?
31-12-2011
1901-69-12

Tuesday, November 8, 2011

तुम्हें कहे बिना रह भी ना पाऊँ


तुम्हें
तकलीफ भी देना
ना चाहूँ
तुम्हें कहे बिना रह भी
ना पाऊँ
हम तो सह रहे हैं
तुम्हें सहना ना पड़ें
कैसे तुम्हें अपने दर्द
बताऊँ?
कोई और समझ
नहीं सकता
सुकून दे नहीं सकता
निरंतर मन में चल रहे
असमंजस को कैसे
मिटाऊँ ?
08-11-2011
1758-26-11-11

Saturday, October 15, 2011

शोख अंदाज़ अब मायूसी में बदल गया


ज़ख्म खाना
रोज़ का काम हो गया
भरी दोपहर अन्धेरा
छा गया
रात दिन में फर्क
करना  
मुश्किल हो गया
सहना आदत में
शुमार हो गया
सब्र अब मरहम
बन गया
निरंतर बेबसी में
जीना
मजबूरी बन गया
शोख अंदाज़
अब मायूसी में
बदल गया
15-10-2011
1657-65-10-11

Sunday, April 10, 2011

किसी पर तो यकीन किया करो

गम सहना
अब आदत बन गया
तरीका
जीने का हो गया
ना समझा किसी ने
अब तक
तुमने भी गलत समझा
मुझे
तुमने भी वही किया
जो किया लोगों ने
साथ मेरे
इल्तजा छोटी सी
मेरी भी सुन लो
क्या खता हुयी मुझ से
इतना तो बता दो
वादा मेरा भी ले लो
गर खता हुयी मुझ से
सर झुका कर कबूलंगा
नहीं तो
वादा तुमसे भी लूंगा
निरंतर सब को
एक नज़र से देखना
छोड़ दो
किसी पर तो यकीन
किया करो
10-04-2011
644-77-04-11