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Saturday, December 15, 2012

सुबह बड़ी शिद्दत से सजता संवारता हूँ



सुबह बड़ी शिद्दत से
सजता संवारता हूँ
शाम तक बासी फूल सा
मुरझा जाता हूँ
मगर उसका दीदार नहीं होता
बनने संवारने में ज़िन्दगी
गुजारता हूँ
पर उम्मीद का दामन नहीं
छोड़ता हूँ
आईने को रोज़ तसल्ली देता हूँ
सब्र रखने की ताकीद करता हूँ
एक दिन मेरे चेहरे के साथ
एक खूबसूरत चेहरा भी
दिखाऊंगा
जब तक तो मुझे ही बर्दाश्त
करना पडेगा
आइना खामोशी से
मुझे सजने संवारने देता है
वो भी मेरी मजबूरी
समझता है
951-70-15-12-2012
मजबूरी,शायरी,चाहत,हसरत,अरमान,मोहब्बत ,ख्वाहिश

Tuesday, August 21, 2012

बुढापे पर कविता -जब उम्र का बोझ बढ़ जाए



जब उम्र का
बोझ बढ़ जाए
लाचारी जीवन का
सच बन जाए
मजबूरी में जीना
पड़ता है
कदम कदम पर
समझौता करना
पड़ता है
बाप को बेटा बन कर
रहना पड़ता है
फिर भी हँसते हुए
दिखना होता है
बहुत खुश हूँ
कहना पड़ता है
21-08-2012
672-32-08-12,

Saturday, March 17, 2012

लाचारी में


एक जोर की
किलकारी गूंजी
एक जान ने धरती पर
आँखें खोली
सड़क किनारे लेटी
माँ की आँखें खुशी से
नम हो गयी
अगले ही पल
खुशी हवा हो गयी
सोचने लगी
नन्ही सी जान को
कैसे खिलायेगी,पिलाएगी
अपना पेट भरना 
ही कठिन
इसकी भूख कैसे मिटाएगी
कैसे हवस के भूखे
भेड़ियों से
इसकी अस्मत बचायेगी
विचारों ने पथ
चेहरे ने रंगत बदली
लाचारी में खुद से 
कहने लगी
जो होगा देखा जाएगा
जैसे मैं अब तक जी 
रही हूँ
वैसे ही ये भी जी लेगी
जो भी इसकी
किस्मत में लिखा होगा
भुगत लेगी
अभी तो इसका पेट
भर दूं
जो मेरे हाथ में है वो
तो कर दूं
फिर उसे दूध पिलाने
लगी
17-03-2012
392-126-03-12

Sunday, March 11, 2012

ना चाहो तो

ना चाहो तो
ख़त का जवाब ना दो
ना कभी मिलो हमसे
जानते हैं
कुछ तो मजबूरी होगी
तुम्हारी
जो रूबरू नहीं होते
हमसे
तुम याद करते हो
यही काफी हमारे लिए
रिश्तों को तोड़ना
हमारी फितरत नहीं
किसी और सहारे की
हमको ज़रुरत नहीं
तुम खुश रहो
यही काफी है जीने
के लिए   
11-03-2012
346-79-03-12

Tuesday, January 24, 2012

विश्वास-अविश्वास-विश्वास


सर्द रात
फटे हुए कपड़ों में
सर घुटनों में छुपाए
सिसकियाँ ले कर
आंसू बहा रही थी
सर्दी में काँप रही थी
उस पर मेरी दृष्टि पडी
रोने का कारण
जानने की जिज्ञासा बड़ी
पास जाकर पूंछा
तो एक शब्द ना बोली
पहले से अधिक जोर से 
फफक फफक कर रो पडी
बार बार पूछने पर
विश्वास रखो
मदद करूंगा कहते ही
एकदम बिफर पडी
रोते रोते चिल्लाते हुए
पूरे आवेग से बोल पडी 
तुम भी कर लो
जो तुम्हें करना है
सब झूठ बोलते हैं
मुझे किसी पर विश्वास नहीं
पहले भी चार लोगों ने
मदद के बहाने
मुझे हवस का शिकार
बनाया
अब तुम भी मनमानी
कर लो
कहते कहते कांपते हुए
जमीन पर बैठ गयी
मुझे काटो तो खून नहीं
आगे एक शब्द भी नहीं
बोल सका
अपना कोट उतार कर
उसे ओढ़ा दिया
हाथ में पांच सौ का नोट
थमा दिया
भारी मन से  सोचता हुआ
घर की और चल दिया
कोई किसी की मजबूरी का
इतना फायदा कैसे उठा
सकता है?
उसका विश्वास शब्द  से ही
विश्वास उठ जाए 
हर व्यक्ति उसे हैवान
दिखाई देने लगे
तभी
पीछे से आवाज़ आयी
मुड के देखा तो
वो मेरे पीछे पीछे
चली आ रही थी
कहने लगी
बाबूजी मुझे माफ़ करना
आप पर विश्वास है
आपके पैसे वापस ले लो
सुबह से भूखी हूँ
पहले मुझे कुछ खिला दो
फिर मेरा इलाज
करवा कर
मुझे घर पहुंचा दो
मुझे  विश्वास नहीं हुआ
सोच में डूब गया 
अविश्वास
इतना शीघ्र विश्वास में
कैसे बदल गया ?
24-01-2012
76-76-01-12

Monday, January 2, 2012

मोहब्बत के पिंजड़े में


मोहब्बत के
पिंजड़े में दिल
चुपचाप ग़मों को
सहता रहता
मजबूरी की
सलाखों के पीछे
दुखी होता रहता
इंतज़ार में
तड़पता रहता
उड़ने को बेचैन
मगर बेबसी में
परेशां होता रहता
कब पैगाम आयेगा ?
दीदार उसका होगा
निरंतर ख्यालों  में
डूबा रहता
उम्मीद में ना सो
पाता
ना जाग पाता
02-01-2012
08-08-01-12

Monday, December 12, 2011

अपनों का खार सहता रहा

अपनों का
खार सहता रहा
 दूसरों पर
मोहब्बत लुटाता रहा
अश्कों को हंसी से
छुपाता रहा
दिल में रोता रहा
सुकून की तलाश में
निरंतर भटकता रहा
ना वफ़ा मिली
ना सुकून मिला
उम्मीद में
वक़्त गुजारता रहा
ना शिकवा
ना शिकायत किसी से
जो लिखा था किस्मत में
भुगतता रहा
ग़मों से
दोस्ती निभाता रहा
तन्हाई में जीता रहा 
12-12-2011
1854-22-12

Wednesday, November 23, 2011

क्षणिकाएं -6


मजबूरी
करना नहीं चाहता
फिर भी करना पड़ता
*****
अंतर्द्वंद्व
करूँ तो
मन खुश नहीं होगा
नहीं करूँ तो
दूसरों को नाराज़
करना होगा
*****
विडंबना
मैं उन्हें बहन
समझता
वो मुझे शक से
देखती
*****
खुश
मैं रोज़ सपनों में
उनको देख लेता हूँ
थोड़ी देर खुश हो
लेता हूँ

*****
दिल में
दिल में बहुतों के लिए
कुछ होता रहता है
मजबूरी में
इंसान खामोश
रहता है

*****

बदकिस्मती
उनका
इंतज़ार करते करते
सो गया
जब तक जागा
वो आकर चले गए
23-11-2011
1810-81-11-11

Tuesday, November 8, 2011

उसकी महक से पता चला


उसकी महक से
पता चला
दूर कहीं फूल खिला
दिल हमारा मचल पडा
उस से मिलने की
ख्वाइश का सिलसिला
चल पडा
अब हर रात खामोश 
हर दिन उदास था
ख्याल जहन में सिर्फ
उससे मिलने का था
निरंतर मुस्काराता चेहरा
अब बेहाल था
दिल का तडपना
मजबूरी था  
08-11-2011
1756-24-11-11

मजबूरी में हँसता हूँ


क्या करूँ?
मजबूरी में हँसता हूँ
ग़मों को छुपा कर
रखता हूँ
लोगों से डरता हूँ
सवालों से बचता हूँ
दिलासा के नाम पर
सैकड़ों सवाल पूछेंगे
जवाब पर यकीन
ना करेंगे  
निरंतर नश्तर चुभायेंगे
ग़मों को भूलने ना देंगे
ज़ख्मों को फिर से हरा
कर देंगे
मुझे जीने ना देंगे
06-11-2011
1751-20-11-11