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Friday, March 22, 2013

रात को चांदनी मुस्काराई होगी



रात को
चांदनी मुस्काराई होगी
सवेरे धूप भी खिली होगी
सड़कों पर
चहल पहल हुई होगी
चिड़ियाएं चचहाई होगी
मंदिर की
घंटियाँ भी बजी होगी
पर उसे क्या
उसकी ज़िन्दगी तो
समाप्त होने वाली है
थोड़ी देर में उसे
फांसी होने वाली है
सदा के लिए तन्हाई
विदा लेने वाली है
41-41-22-01-2013
जीवन, मृत्यु ,तन्हाई, फांसी
डा.राजेंद्र तेला ,निरंतर  

Saturday, December 8, 2012

जब दिल टूट जाता हैं



जब दिल टूट जाता हैं
शहर अजनबी लगता
रास्ते अजनबी लगते
लोग अजनबी लगते
सिर्फ बेवफाई के
अफ़साने याद रहते
क्यूं मोहब्बत का
ज़हर पीया था
ख्याल तंग करते
तन्हाई साथ निभाती
हर चेहरे पर उम्मीद की
रोशनी नज़र आती
कोई तो कह दे
वो भूले नहीं हैं
अब भी याद करते हैं
फिर लौटने की
ख्वाहिश रखते हैं
920-38-08-12-2012
अफ़साने,तन्हाई,दिल,मोहब्बत, याद

Tuesday, November 6, 2012

तुम्हें पा ना सका


तुम्हें पा ना सका
तुम्हें पा ना सका
ज़िन्दगी संवार ना सका
तन्हाई को दोस्त
सुकून को
दुश्मन बना लिया
समंदर की उम्मीद में
चुल्लू भर
पानी भी नहीं मिला
चेहरा मायूस हो गया
होंसला टूट गया
तुमने बेरुखी से कह दिया
हमने कभी मोहब्बत का
इरादा ही नहीं किया
828-12-06-11-2012
सुकून,ज़िन्दगी,तन्हाई, मोहब्बत

Wednesday, October 24, 2012

मंजिल की तलाश में



मंजिल की तलाश में
ज़िन्दगी भर
उनके पैगाम का इंतज़ार
करता रहा
जब तक पैगाम आया
मंजिल का
पता बदल चुका था
तन्हाई को
मंजिल मान चुका था 
समझ चुका था 
इक दिन तो
किसी एक को तनहा
रहना होगा
अकेले में रोना होगा
789-31-24-10-2012
मंजिल,तलाश,ज़िन्दगी ,मोहब्बत,तन्हाई,

Tuesday, August 21, 2012

तनहा हूँ भी तनहा नहीं भी



रोज़ दिखते हैं नए नए चेहरे
दिखते नए नए नए मंज़र भी

मिलता हूँ नए नए लोगों से
देखता हूँ नए नए नज़ारे भी

दिखते तो साए भी हैं रोज़ हमें
कभी निभाते नहीं साथ वो भी

इतनी भीड़ में भी अकेला हूँ 
तनहा हूँ भी तनहा नहीं भी
21-08-2012
671-31-08-12

Tuesday, April 17, 2012

ये दिल तेरे लिए धडकता क्यूं है ?


ये दिल तेरे लिए
धडकता क्यूं है ?
तेरे बिना तन्हाई का
आलम क्यूं है ?
दिन के उजाले में
अन्धेरा क्यूं है ?
मेरे सवाल का
जवाब दे दो
या फिर दिल की
महफ़िल सज़ा दो
ऐसे सताने का हक
तुम्हें नहीं है
चाहने वालों को
दुत्कारना ठीक
नहीं है
न चाहो तो
मुस्कारा कर ना
कह दो
पर इस तरह
तडपा कर ना
मारो
17-04-2012
451-31-04-12

उसके रुसवा होना से.....


उसके रुसवा होना से
ज़िंदा रहना दुश्वार
हो गया
किस उम्मीद से
घर के दरवाज़े पर
खडा होऊँ ?
अब तो घर के सामने से भी
कोई गुज़रता नहीं
मेरे दिल के आँगन जैसे
मेरे घर की गली भी
सुनसान हो गयी
दिल टूट कर बिखर
ना जाए कहीं
वक़्त से पहले ही
तन्हायी जान ना ले ले
अब शहर से ही रुखसत
लेनी होगी
उम्मीदों की नगरी
कहीं और बसानी होगी
17-04-2012
447-27-04-12

Friday, December 23, 2011

अब क्या देखना बाकी है?


तुम्ही बताओ
अब क्या देखना 
बाकी है?
हमने तुम्हारी रुसवाई
देख ली
तुम्हारी महफ़िल से
हमारी विदाई देख ली
दिन के उजाले में
अंधेरी रात देख ली
भरी पूरी दुनिया में
तन्हाई देख ली
हसरतों की मौत
देख ली
अब देखना को
बचा ही क्या है?
मोहब्बत में
नफरत की इन्तहा
देख ली
हमने जीते जी
क़ज़ा देख ली
23-12-2011
1881-49-12

Monday, December 12, 2011

अपनों का खार सहता रहा

अपनों का
खार सहता रहा
 दूसरों पर
मोहब्बत लुटाता रहा
अश्कों को हंसी से
छुपाता रहा
दिल में रोता रहा
सुकून की तलाश में
निरंतर भटकता रहा
ना वफ़ा मिली
ना सुकून मिला
उम्मीद में
वक़्त गुजारता रहा
ना शिकवा
ना शिकायत किसी से
जो लिखा था किस्मत में
भुगतता रहा
ग़मों से
दोस्ती निभाता रहा
तन्हाई में जीता रहा 
12-12-2011
1854-22-12

Thursday, December 1, 2011

क्षणिकाएं -9


छुपाना
क्या क्या छुपाऊँ ?
कब तक छुपाऊँ?
किस किस से छुपाऊँ ?
झूठ का आवरण
ना हटाऊँ ?
मन की व्यथा बढाऊँ
चैन ना पाऊँ
****
मसले
अगर झगड़ने से
मसले हल हो जाते
लोग प्रेम का
नाम नहीं जानते
****
 ढूंढ रहे थे
हम उन्हें शहर की
गलियों में ढूंढ रहे थे
वो हमारे घर में बैठे
इंतज़ार कर रहे थे 
****
मोहब्बत का मतलब
वो निरंतर हमें
मुस्कारा कर देख रहे थे
इशारे से
अपने पास बुला रहे थे
हम शब्दकोष में
मोहब्बत का मतलब
ढूंढ रहे थे
****
वो हमें
शक से देखते हैं
कसूर उनका नहीं
वो मर्दों से घबराते हैं
उनके
किस्सों से डरते हैं
****
नाराजगी 
नाराजगी क्यों हुयी ?
समझ में नहीं आयी
नाराजगी हुयी
ये समझ आ गयी
****
रोते रहते
बीते समय को
याद कर
रोते रहते
वर्तमान ,
भविष्य दोनों को
नष्ट करते
****
हँसी- खुशी
जीवन

हँसी खुशी से गुजरे
अच्छा लगता
कष्ट में गुजरे
बोझ लगता

तन्हाई
अब तन्हाई से
दोस्ती हो गयी
ज़िन्दगी की हकीकत
समझ आ गयी
****
धोखा
जिसने बार बार
धोखा खाया
वो दहशत में जीता है
जिसने भुगता
वही समझता है
****
मसीहा
लोगों को
रास्ते से हटाते रहे
मसीहा बनने के
ख्वाब देखते रहे
01-12-2011
1833-98-11-11

Saturday, November 12, 2011

मेरी तन्हाई मुझसे कहने लगी


मेरी तन्हाई
मुझसे कहने लगी
क्यों हँसना भूल गए ?
क्या निरंतर रोते
रहोगे ?
कब तक ग़मगीन
चेहरा लेकर बैठे
रहोगे ?
मुझे ग़मों में ना
डुबाओ
तुम तो मेरे आगोश में
गम हल्का कर लेते हो
मैं कहाँ जाऊंगी ?
थोड़ा मेरा भी
ख्याल करो
12-11-2011
1780-51-11-11

Sunday, May 29, 2011

तन्हाई और गम,अब दोस्त हो गए

तन्हाई और गम
अब दोस्त हो गए
अब दिन भी अँधेरे
हो गए
बेचैनी ज़िन्दगी का
हिस्सा बन गयी
सुकून बात पुरानी
हो गयी
आस निरंतर कम
हो गयी
क्या सोचा था ?
क्या मिला ?
क्यों मिला ?
कुछ समझ नहीं
आता अब
कब ख़त्म होगी ?
कब गहरी नींद में
सोऊँगा ?
नहीं सोचता अब
29-05-2011
951-158-05-11