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Saturday, February 18, 2012

जीवन में जब अंधियारा हो

जीवन में
जब अंधियारा हो
ह्रदय तलाशता कोई
सहारा हो
मन व्यथित हो कर
रोता हो
कोई अजनबी ऐसा
मिल जाए
सुन हाल तुम्हारे
रो जाए
सीने से तुम्हें फिर
लगा ले
दे साथ तुम्हारा 
भरपूर
ना थके ना रुके
जब तक तुम्हें ना 
हंसा दे 
मत पूँछिये ऐसे 
अजनबी को
क्या कहिये ?
या तो मसीहा या 
फिर खुदा कहिये
18-02-2012
191-102-02-12

Saturday, February 11, 2012

ना जाने क्यूं खफा रहते हैं

ना जाने
क्यूं खफा रहते हैं
हमसे
किस गुस्ताखी की
सज़ा देते हैं हमको
क्या खता हुयी हमसे
जो हाथ पकड़ा 
फिर झटक दिया
फिर से मंझधार में
डुबो दिया
ना खुल कर कहते हैं
ना ज़रिये
पैगाम बताते हैं
बामुश्किल हँसा था
खुद को सम्हाला था
उनमें एक मसीहा
देखा था हमने
ना जाने
क्यूं अब रुलाते हैं
खामोशी से जान
लेते हैं
ना जाने क्यूं
खफा रहते हैं हमसे
11-02-2012
146-57-02-12

Friday, February 10, 2012

मसीहा

दर्द हद से
गुजरने लगा
आखों से
आंसू बहाने लगा
हालात से लड़ना
मुश्किल हो गया
दिन के उजाले में
अन्धेरा छा गया
खुद को अकेला
समझने लगा 
तभी ज़िन्दगी में
खुदा ने एक
अजनबी को भेजा
उसने आँखों के 
आंसू पौंछे
ज़ख्मों पर मरहम
लगाया
होंसला बढाया
ज़हन में छाये
अँधेरे कोहटाया
जीने का अर्थ
समझाया
खिजा सी 
ज़िन्दगी को
बागे बहार में 
बदला
वो अजनबी नहीं
एक मसीहा है
मेरे लिए
10-02-2012
139-50-02-12

Thursday, December 1, 2011

क्षणिकाएं -9


छुपाना
क्या क्या छुपाऊँ ?
कब तक छुपाऊँ?
किस किस से छुपाऊँ ?
झूठ का आवरण
ना हटाऊँ ?
मन की व्यथा बढाऊँ
चैन ना पाऊँ
****
मसले
अगर झगड़ने से
मसले हल हो जाते
लोग प्रेम का
नाम नहीं जानते
****
 ढूंढ रहे थे
हम उन्हें शहर की
गलियों में ढूंढ रहे थे
वो हमारे घर में बैठे
इंतज़ार कर रहे थे 
****
मोहब्बत का मतलब
वो निरंतर हमें
मुस्कारा कर देख रहे थे
इशारे से
अपने पास बुला रहे थे
हम शब्दकोष में
मोहब्बत का मतलब
ढूंढ रहे थे
****
वो हमें
शक से देखते हैं
कसूर उनका नहीं
वो मर्दों से घबराते हैं
उनके
किस्सों से डरते हैं
****
नाराजगी 
नाराजगी क्यों हुयी ?
समझ में नहीं आयी
नाराजगी हुयी
ये समझ आ गयी
****
रोते रहते
बीते समय को
याद कर
रोते रहते
वर्तमान ,
भविष्य दोनों को
नष्ट करते
****
हँसी- खुशी
जीवन

हँसी खुशी से गुजरे
अच्छा लगता
कष्ट में गुजरे
बोझ लगता

तन्हाई
अब तन्हाई से
दोस्ती हो गयी
ज़िन्दगी की हकीकत
समझ आ गयी
****
धोखा
जिसने बार बार
धोखा खाया
वो दहशत में जीता है
जिसने भुगता
वही समझता है
****
मसीहा
लोगों को
रास्ते से हटाते रहे
मसीहा बनने के
ख्वाब देखते रहे
01-12-2011
1833-98-11-11