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Sunday, September 2, 2012

बड़ी विडंबना है



बड़ी विडंबना है
लोग तीर कमान
पकड़ना भी नहीं जानते
खुद को माहिर तीरंदाज़
कहते हैं
सहारे बिना चल भी
नहीं पाते
अनुभव की बात करते हैं
खुद को पहचानते नहीं
दुनिया को पहचानने का
दावा करते हैं
बातें करने में उस्ताद
कुछ करने के नाम पर
निकम्मा साबित होते हैं
फिर भी कभी सुधरने का
नाम तक नहीं लेते
02-09-2012
717-14-09-12

Wednesday, November 23, 2011

क्षणिकाएं -6


मजबूरी
करना नहीं चाहता
फिर भी करना पड़ता
*****
अंतर्द्वंद्व
करूँ तो
मन खुश नहीं होगा
नहीं करूँ तो
दूसरों को नाराज़
करना होगा
*****
विडंबना
मैं उन्हें बहन
समझता
वो मुझे शक से
देखती
*****
खुश
मैं रोज़ सपनों में
उनको देख लेता हूँ
थोड़ी देर खुश हो
लेता हूँ

*****
दिल में
दिल में बहुतों के लिए
कुछ होता रहता है
मजबूरी में
इंसान खामोश
रहता है

*****

बदकिस्मती
उनका
इंतज़ार करते करते
सो गया
जब तक जागा
वो आकर चले गए
23-11-2011
1810-81-11-11

Tuesday, May 31, 2011

विडंबना


खिड़की के
बाहर देखता हूँ 
निरंतर
हरा दिखने वाला पेड़
आज पीला लग
रहा था
बुलबुल का जोड़ा
खामोश बैठा है
कुछ लोग
मेरे चारों तरफ खड़े हैं
कोई भी हंस नहीं रहा
सबके चेहरे उदास  हैं
शरीर में दर्द और
हाथों में
चुभन हो रही है
नज़र डाली तो
 शरीर पट्टीयों से ढका था
ड्रिप चढ़ रही थी
समझ में आ गया
अस्पताल के पलंग पर
पडा हूँ
तभी धीरे से किसी को
बोलते सुना
होश में आ गए हैं
लगता है बच जायेंगे
सड़क पर घायल पड़े थे
भला हो ट्रक वाले का
जो अस्पताल लेकर आया
किसी को पता नहीं  था
किस्मत ने बचाया था
अस्पताल के बाहर
तडके ट्रक की टक्कर से ही
घायल हुआ था
ट्रक वाला तो
ट्रक को भगा कर ले
गया था
31-05-2011
972-179-05-11