Showing posts with label व्यथा. Show all posts
Showing posts with label व्यथा. Show all posts

Saturday, March 23, 2013

मन के अँधेरे कोने में छुपी व्यथा



मन के अँधेरे
कोने में छुपी व्यथा
बार बार मन को
कचोटती है
क्यों उसे एकांत के
अँधेरे में बाँध रखा है
खोखली हंसी के पीछे
छुपा रखा है
कितना भी हँस लो
चेहरे पर चेहरा चढ़ा लो
एक दिन सब्र का बाँध
टूट ही जाएगा
मैं बाहर आ जाऊंगी
तब भी तो तुम्हें
दुनिया को अपना असली
चेहरा दिखाना पडेगा
क्यों ना आज ही मुझे
मन के अँधेरे कोने से
बाहर निकाल कर
कुंठा मुक्त कर दो
तुम स्वयं भी कुंठा
मुक्त हो जाओ
42-42-23-01-2013
मन ,व्यथा,व्यथित कुंठा,जीवन
डा.राजेंद्र तेला ,निरंतर

Wednesday, March 20, 2013

कुछ पल के लिए ही सही



ह्रदय की हलचल
मन की खुशी
जीवन की व्यथा
मैंने सांझा करी तुमसे
मैं नहीं कहता
तुम भी सांझा करो
अपने ह्रदय की हलचल
मन की खुशी
पर जीवन की व्यथा तो
सांझा कर लो मुझसे
सुलझा तो नहीं पाऊंगा
पर दिलासा तो दे पाऊंगा
कुछ पल के लिए ही सही
तुम्हारे मन को
चैन तो दे पाऊंगा
38-38-19-01-2013
चैन,हलचल,दिलासा,सांझा करना,व्यथा ,जीवन   
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

Friday, March 15, 2013

विचारों से द्वंद्व करते करते



विचारों से
द्वंद्व करते करते
नींद की गोद में समाया ही था
खिड़की पर आहट ने
आधी नींद से जगा दिया
खिड़की खोलते ही हवा का
झोंका कमरे में आया
हवा से नींद भंग करने का
कारण पूछा
हवा मुस्काराते हुए बोली
बर्फीले पहाड़ों से होते हुए
गर्म रेगिस्तान में झुलसते हुए
नदी के बहते पानी को छूते हुए
वृक्षों के हरे भरे पत्तों के
बीच से छनते  हुए
महकते फूलों को चूमते हुए
तुम्हें बंद दरवाजों के
अँधेरे कमरे से
छुटकारा दिलाने आयी हूँ
आओ उठ खड़े हो जाओ
मेरे साथ चलो
प्रकृति का आनंद लो
व्यथा को कम करो
मेरे जैसे ही निरंतर बहते रहो
28-28-15-01-2013    
 हवा,पवन,वायु ,बयार ,पर्यावरण,जीवन , व्यथा,प्रकृति
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

Tuesday, December 11, 2012

क्यों किसी से मन की बात कहूँ?



क्यों  किसी से
मन की बात कहूँ?
क्या पता उसकी भी
व्यथा मेरे जैसी ही हो
क्यों किसी की
दुखती रग को छेड़ूँ
मेरी व्यथा तो कम
होगी नहीं
किसी और की व्यथा
क्यों बढाऊं?
दर्द को समझने वाले
मेरे चेहरे को देख कर ही
मनोस्थिति समझ जायेंगे
स्वयं आकर पूछ लेंगे
निदान तो नहीं कर पायेंगे
मगर दिलासा अवश्य देंगे
मन का बोझ
अवश्य कम कर देंगे
925-43-12-12-2012
मनोस्थिति, दर्द, व्यथा, दुखती रग

Saturday, December 8, 2012

व्यथा में



व्यथा में रोते रोते
अचानक ख्याल आया
रोने से किसी को नहीं मिला
तो मुझे कैसे मिलेगा
मन की व्यथा कम करनी है
तो क्यों ना
किसी अपने से बात कर लूं
जो मन को पसंद हो
वो काम कर लूं
अच्छा संगीत सुन लूं
अच्छी किताब पढ़ लूं
मन को हल्का कर लूं
अपने को व्यवस्थित कर लूं
फिर से काम में जुट जाऊं
फिर कभी व्यथित ना होऊँ
ऐसा सोच रख लूं
924-42-08-12-2012
व्यथा ,व्यथित,रोना ,जीवन

Wednesday, December 5, 2012

कभी जब लिखने बैठता हूँ



कभी जब लिखने
बैठता हूँ
शब्द खो जाते हैं
कलम रुक जाती है
कागज़ रीता रह जाता है
मन से पूछता हूँ
ऐसा क्यों होता है
बुझे चेहरे से मन
कहता है
जब मैं व्यथित होता हूँ
ऐसा होता है
पर स्वयं में विश्वास
रखोगे
तो कल ऐसा नहीं होगा
खोये शब्द मिल जायेंगे
कलम चलने लगेगी
कागज़ भी
रीता नहीं रहेगा
निश्चित ही
एक अच्छी रचना का
जन्म होगा
पढ़ कर तुम्हें भी आनंद
मिलेगा
902-20-05-12-2012
जीवन,व्यथित,व्यथा

Monday, December 3, 2012

जब कोई मेरा अपना व्यथित हो तो



मेरे मिलने वाले पूछते हैं
आज कल आप व्यथित
क्यों रहते हो
सदा गंभीर चेहरा लिए
दिखते हो
जवाब में जब कहता हूँ
जब कोई मेरा अपना
व्यथित हो तो
मैं कैसे खुश रह सकता हूँ
सुनने को मिलता है
आपके परिवार वाले तो
सब खुश दिखते हैं
फिर आप ऐसा क्यों कहते हैं
कैसे बताऊँ
अपने केवल परिवारवाले
या रिश्तेदार नहीं होते
जो भी प्रेम रखते हैं
जिनसे भी मन मिलता है
वो भी तो मेरे अपने ही हैं
उनमें से एक भी अगर
व्यथित है
तो फिर मैं कैसे खुश
रह सकता हूँ
892-11-03-12-2012
रिश्ता,अपनापन,व्यथित,व्यथा,अपने,पराये, खुशी

Wednesday, November 28, 2012

पीड़ित मन



पीड़ित मन से
रोते रोते अचानक
ख्याल आ गया
रोने से किसी को नहीं मिला
तो मुझे कैसे मिलेगा
मन की व्यथा कम करनी है
तो क्यों ना
किसी अपने से बात कर लूं
जो मन को पसंद हो
वो काम कर लूं
अच्छा संगीत सुन लूं
अच्छी किताब पढ़ लूं
मन को हल्का कर लूं
अपने को व्यवस्थित कर लूं
फिर से काम में जुट जाऊं
फिर कभी व्यथित ना होऊँ
ऐसा सोच रख लूं
जो होना है वो हो कर रहेगा
रोने से किसी को नहीं मिला
तो फिर मुझे कैसे मिलेगा
880-64-28-11-2012
व्यथा,व्यथित,मन,पीड़ा,जीवन

Thursday, July 5, 2012

खामोश रहो



खामोश रहो
कुछ मत बोलो
अपने गम अपने तक
रख लो
ना विरोध करो ना
प्रतिरोध करो
कोई कुछ कहे
चुपचाप सुन लो
ना व्यथित हो
ना आंसू बहाओ
पहले भी
तुमने विरोध किया
क्या नतीजा निकला ?
क्या सिला मिला ? 
बचा खुचा विश्वास खोया
खुद को चौराहे पर
खडा पाया
किधर जाना है?
पता नहीं था
क्यों भूल गए?
बहुत मुश्किल से खुद को
सम्हाला था
क्या बार बार ऐसा ही
चाहते हो
कब तक लड़ोगे
लोगों को बदलने की
कोशिश करोगे
बार बार हारोगे
खुद के अस्तित्व को
खतरे में डालोगे
क्यों ना समर्पण कर दो?
सबकी इच्छा का पालन
कर लो
 नाराजगी दूर कर दो
प्रभु में विश्वास रखते हो
तो उस पर छोड़ दो
वो जैसा चाहता है
वैसा ही होगा
लड़ोगे तो भी
नहीं लड़ोगे तो भी
तुम कर्म करते रहो
ईमान से जीते रहो
सब्र से सहते रहो
अब समय आ गया है
भाग्य पर छोड़ दो
जो भाग्य में लिखा है
हो जाएगा
नहीं चाहोगे तो भी
चाहोगे तो भी
05-07-2012
604-01-07-12

Monday, June 25, 2012

क्यों कहते,तुम अकेले हो



क्यों कहते,तुम अकेले हो
किसी के साथ कोई नहीं होता
तुम कहते तुम अकेले हो
हर तरह के
इंसान मिलते जीवन में
जो हँसाते भी हैं
रुलाते भी हैं
दर्द कम भी करते हैं
बढाते भी हैं
ये तुम पर निर्भर है
तुम किस की बातों से
प्रभावित होते हो
किसी को ढूँढने से पहले
खुद को सु द्र ढ बनाओ
खुद पर विश्वास रखो
फिर कोई मिले ना मिले
खुद को अकेला नहीं पाओगे
खुद रास्ता बनाओगे
न विफलता का मुंह देखोगे
ना कभी किसी से कहोगे
तुम अकेले हो
25-06-2012
597-47-06-12

वटवृक्ष के सानिध्य में



आज फिर
व्यथित मन से
वटवृक्ष के नीचे आ
बैठा हूँ
सदा की तरह
सारी व्यथा रो रो कर
निकालूँगा
विशाल ह्रदय वाले
वटवृक्ष ने
सदा मौन रह कर
मेरी हर व्यथा को
धैर्य से सुना है
उसका मौन मेरे लिए
सदा ही
होंसला बढाने वाला
रहा है
मुझे विश्वास है
आज भी वही होगा
मेरे ह्रदय और मन को
चैन मिलेगा
वटवृक्ष अपना बड़प्पन
रखेगा
अपनी छाया में मुझे
हारने नहीं देगा
आज भी 
पहले से अधिक होंसले से
इसके सानिध्य से
उठ कर जाऊंगा
25-06-2012
591-41-06-12

Tuesday, June 5, 2012

कुर्सी की व्यथा



सदियों से सब ने सदा
लिया ही लिया मुझ से
दिया कभी
धेला भर भी नहीं मुझे
राजाओं ने ,नवाबों ने
विश्व के शीर्ष नेताओं ने
मुझे पाने के लिए
मौत का तांडव मचाया
युद्ध किये ,रिश्ते तोड़े
विश्वासघात किया
कुछ समय के लिए
मुझे पाया भी
लोग आते गए जाते गए
मैं वही की वहीं रही
हज़ारों वर्षों से
अब भी
वही सब देख रही हूँ
व्यथा को सह रही हूँ 
मेरी व्यथा किसी ने
नहीं समझी अब तक
ना चाहते हुए भी
मुझे पाने की चाह में
किये जा रहे कुकृत्यों की
साक्षी हो रही हूँ
05-06-2012
567-17-06-12

Tuesday, February 28, 2012

कलम की व्यथा

मैंने सोचा
आज कुछ नहीं लिखूं
कलम को विश्राम दे दूं
कलम को पता चला
तो बुरा मान गयी
तुरंत बोली
कुछ तो ख्याल करो मेरा
खूब ऊंगलियों में
दबाया
तुमने मुझको
जैसा चाहा,जब चाहा
चलाया मुझको
मन के भाव 
दुनिया को बताने का 
साधन बनाया मुझको
मैंने हँसते हँसते 
सदा साथ निभाया 
तुम्हारे विचारों को
कागज़ पर उकेरा
ना कभी रुकी
ना शिकायत करी
निरंतर चलती रही
फिर आज क्यों नहीं 
लिख रहे हो
कुछ
क्यों व्यथित
कर रहे हो मुझको
यह जानते हो तुम
बिना चले
मन दुखी होता है मेरा
लगता है किसी
काम की नहीं रही
अब निर्णय को बदल दो
मुझे खुश कर दो
कम से कम
एक कविता तो
लिख दो
28-02-2012
260-171-02-12

Thursday, January 5, 2012

समाधान


शमशान में
वर्षों से खडा बरगद का
विशालकाय पेड़
आज कुछ व्यथित था
मन में उठ रहे प्रश्नों से
त्रस्त था
विचार पीछा ही नहीं
छोड़ रहे थे
क्रमबद्ध
तरीके से चले आ रहे थे
क्यों उसका
जन्म शमशान में हुआ?
यहाँ आने वाला
हर व्यक्ति केवल जीवन ,
म्रत्यु और वैराग्य की
बात ही करता
कोई खुशी से
 उसके पास नहीं आता
उसकी छाया के नीचे
कोई सोना नहीं चाहता
ना ही आवश्यकता से
अधिक रुकना चाहता
उसे निरंतर मनुष्यों का
क्रंदन ही सुनना पड़ता
रात में मरघट की शांती
उसे झंझोड़ती रहती
नहीं चाहते हुए भी
राख के ढेर में कुत्तों को
मानव अवशेष ढूंढते
देखना पड़ता 
क्यों उसे जीने के लिए
शमशान ही मिला ?
क्या वो भी मनुष्यों जैसे
पिछले जन्म के
अपराधों की सज़ा काट
रहा?
क्यों उसके भाग्य में ही
एकाकी,नीरस जीवन
जीना लिखा है ?
निरंतर उदास चेहरों को
देखना
उनकी दुःख भरी बातों को
सुनना
हर दिन रोने बिलखने की
आवाज़ सुनना
ही उसके जीवन का सत्य है
तभी उसे नीचे बैठे
वृद्ध साधू की आवाज़
सुनायी दी
वो किसी को कह रहा था
परमात्मा ने जो भी दिया
जैसा भी दिया
जितना भी दिया 
उसे शिरोधार्य करना चाहिए
निरंतर संतुष्ट रहने का
प्रयास करना चाहिए
जब तक जीना है
खुशी से परमात्मा की
इच्छा समझ कर
जीना चाहिए
व्यर्थ ही दुखी होने से
जीवन सुखद नहीं होता
उलटे अवसाद को
निमंत्रण मिलता
जीवन कंटकाकीर्ण
 हो जाता
बरगद को लगा
उसे उसके प्रश्न का
उत्तर मिल गया
उसकी व्यथा का
समाधान हो गया
05-01-2012
14-14-01-12