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Tuesday, June 5, 2012

कुर्सी की व्यथा



सदियों से सब ने सदा
लिया ही लिया मुझ से
दिया कभी
धेला भर भी नहीं मुझे
राजाओं ने ,नवाबों ने
विश्व के शीर्ष नेताओं ने
मुझे पाने के लिए
मौत का तांडव मचाया
युद्ध किये ,रिश्ते तोड़े
विश्वासघात किया
कुछ समय के लिए
मुझे पाया भी
लोग आते गए जाते गए
मैं वही की वहीं रही
हज़ारों वर्षों से
अब भी
वही सब देख रही हूँ
व्यथा को सह रही हूँ 
मेरी व्यथा किसी ने
नहीं समझी अब तक
ना चाहते हुए भी
मुझे पाने की चाह में
किये जा रहे कुकृत्यों की
साक्षी हो रही हूँ
05-06-2012
567-17-06-12

Tuesday, November 29, 2011

क्षणिकाएं -8


बड़े अरमानों से
बड़े अरमानों से
हमने उन्हें फूल
भेंट किये
भोलेपन से वो
पूछने लगे
कहाँ से खरीदे ?
हमें भी किसी
ख़ास को देने हैं
बहुत शिद्दत से
बताने लगे
****
अन्धेरा
लोग घरों को रोशन
करते हैं
दिल-ओ-दिमाग में
अन्धेरा रखते हैं
****
मैं चाहूँ तो हो जाए
मैं चाहूँ हो जाए
कोई और चाहे
तो क्यों हो जाए
****
ज्यादा देने के लिए
ज्यादा देने के लिए
कम लेना सीखो
जो मिले उसे
खुशी से कबूल
कर लो
****
कुर्सी के लिए
सब कुर्सी के लिए
लड़ते
उससे कोई नहीं
पूछता
उस पर बैठने वाला
कैसा होना चाहिए
****
प्रेम की परिणीति
प्रेमियों के
प्रेम की परिणीति
प्रेमी प्रेमिका
दोनों की बेचैनी
****
देता इश्वर है
देता इश्वर है
खाते,पचाते,
भोगते,हम हैं
फिर कहते
हमारा है
****
सहानभूती
सहानभूती के
दो शब्द दिल को
राहत देते हैं
उसमें भी लोग
कंजूसी करते हैं
****
दुविधा
दुविधा मैं पैदा हुआ
दुविधा में जीता रहा
दुविधा में मर गया
करूँ ना करूँ
के जाल में फंसा रहा
****
सामंजस्य बिठाओ 
सामंजस्य बिठाओ 
नहीं तो विद्रोह करो
या फिर सहन करो
29-11-2011
1826-91-11-11