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Tuesday, November 29, 2011

क्षणिकाएं -8


बड़े अरमानों से
बड़े अरमानों से
हमने उन्हें फूल
भेंट किये
भोलेपन से वो
पूछने लगे
कहाँ से खरीदे ?
हमें भी किसी
ख़ास को देने हैं
बहुत शिद्दत से
बताने लगे
****
अन्धेरा
लोग घरों को रोशन
करते हैं
दिल-ओ-दिमाग में
अन्धेरा रखते हैं
****
मैं चाहूँ तो हो जाए
मैं चाहूँ हो जाए
कोई और चाहे
तो क्यों हो जाए
****
ज्यादा देने के लिए
ज्यादा देने के लिए
कम लेना सीखो
जो मिले उसे
खुशी से कबूल
कर लो
****
कुर्सी के लिए
सब कुर्सी के लिए
लड़ते
उससे कोई नहीं
पूछता
उस पर बैठने वाला
कैसा होना चाहिए
****
प्रेम की परिणीति
प्रेमियों के
प्रेम की परिणीति
प्रेमी प्रेमिका
दोनों की बेचैनी
****
देता इश्वर है
देता इश्वर है
खाते,पचाते,
भोगते,हम हैं
फिर कहते
हमारा है
****
सहानभूती
सहानभूती के
दो शब्द दिल को
राहत देते हैं
उसमें भी लोग
कंजूसी करते हैं
****
दुविधा
दुविधा मैं पैदा हुआ
दुविधा में जीता रहा
दुविधा में मर गया
करूँ ना करूँ
के जाल में फंसा रहा
****
सामंजस्य बिठाओ 
सामंजस्य बिठाओ 
नहीं तो विद्रोह करो
या फिर सहन करो
29-11-2011
1826-91-11-11

Sunday, July 31, 2011

दुविधा

दस साल पहले

आखिरी बार मिली थी

अब रास्ते अलग अलग

कह कर विदा हुयी

ना अब मिलती कभी

ना बात कभी होती

मेरी तस्वीर ज़रूर

उसके कमरे के कौने में

पडी मेज़ पर रखी थी

निरंतर धूल खाती थी

कई दिन उस पर नज़र

नहीं पड़ती

जिस दिन नज़र पड़ती ,

मिनिट दो मिनिट

टकटकी लगा कर देखती

चेहरे की रंगत बदलती

रहती

क्या सोच रही थी ?

किसी से ना कहती

कपडे की झाडन से

धूल हटाती

सलीके से फिर मेज़ पर

सजाती

दो चार दिन यही दोहराती

फिर भूल जाती

शायद अब भी तय नहीं

कर सकी थी

मुझ से दूरी रखे या फिर

लौट जाए

मिलने की चाहत रखे या

भूल जाए

ख्यालों के भंवर में फँसी थी

ना तस्वीर फैंकती

ना सीने से लगा कर रखती

ना खुल कर हँस पाती

ना खुल कर रो पाती

दुविधा में जीती जाती

31-07-2011

1273-157-07-11