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Friday, March 15, 2013

विचारों से द्वंद्व करते करते



विचारों से
द्वंद्व करते करते
नींद की गोद में समाया ही था
खिड़की पर आहट ने
आधी नींद से जगा दिया
खिड़की खोलते ही हवा का
झोंका कमरे में आया
हवा से नींद भंग करने का
कारण पूछा
हवा मुस्काराते हुए बोली
बर्फीले पहाड़ों से होते हुए
गर्म रेगिस्तान में झुलसते हुए
नदी के बहते पानी को छूते हुए
वृक्षों के हरे भरे पत्तों के
बीच से छनते  हुए
महकते फूलों को चूमते हुए
तुम्हें बंद दरवाजों के
अँधेरे कमरे से
छुटकारा दिलाने आयी हूँ
आओ उठ खड़े हो जाओ
मेरे साथ चलो
प्रकृति का आनंद लो
व्यथा को कम करो
मेरे जैसे ही निरंतर बहते रहो
28-28-15-01-2013    
 हवा,पवन,वायु ,बयार ,पर्यावरण,जीवन , व्यथा,प्रकृति
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

Tuesday, October 23, 2012

ये हवा भी ना जाने कितने चेहरे बदलती है



ये हवा भी ना जाने
कितने चेहरे बदलती है
कभी आंधी बन कर
कभी तूफ़ान बन कर
तांडव मचाती है
कभी मंद शीतल
मधुर स्वर लहरी सी
कानों में बंसी बजाती है
मन को प्रफुल्लित करती है
कभी गोरियों के आँचल से
कभी बालों से
अठखेलियाँ करती है
आशिक मिजाजी का
सबूत देती है
कभी सांय सांय की
ध्वनी से
मरघट की याद दिलाती है
पता नहीं कहाँ से आती है
कहाँ जाती है
ये हवा भी ना जाने
कितने चेहरे बदलती है
776-21-23-10-2012
हवा, चेहरे, अठखेलियाँ

Thursday, March 31, 2011

आसमान निरंतर रंग बदलता

आसमान
निरंतर रंग बदलता
कभी नीला,कभी लाल दिखता
सूर्य की लालिमा
अपने में समेटता
तपन बर्दाश्त करता
ऊर्जा जग को देता
जीवन को साकार करता
कभी चाँद की चांदनी में
चमकता
तारे गहने उसके,
आभा उसकी बढाते
पंछी उड़ कर,ठहरे हुए को
गतिमान बनाते
किस्म,किस्म के बादल
रूप जीवन के दर्शाते
घनघोर काले
वर्षा से जहाँ को भिगोते
जीवन का अहसास भरते
रुई से सफ़ेद बादल
परियों के देश के लगते
हवाओं में उड़ते रहते
पृथ्वी से उठा
काला,पीला धुंआ जज्ब करता
आकाश निरंतर स्थिर रहता
चुपचाप सब सहता रहता
भावनाओं में ना बहता
31-03-03
561—231-03-11