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Sunday, June 5, 2011

इंसान के हाथ में लालच की कुल्हाड़ी थी

जंगल में घबराहट थी
इंसान के हाथ में
लालच की  कुल्हाड़ी थी
कुल्हाड़ी की सत्ता थी
धन लालच के चक्कर में
बेरहमी से चल रही थी
सबसे बड़ा पेड़ घबरा गया
बाकी पेड़ों से कहने लगा
पहला वार मुझ पर होगा
तुम्हारा नंबर बाद में
 आयेगा
हिम्मत ना हारना
जो किस्मत में लिखा
सहना होगा
अब इंसान भ्रष्ट हो गया
माँ बाप को भी नहीं
छोड़ता
पेड़ों को क्या छोड़ेगा
निरंतर
शोषण पेड़ों का किया
पानी को व्यर्थ बहाया
अब धरती को भी नहीं
छोड़ेगा
लालच में भूल गया
बिना पेड़ पानी के कैसे
जियेगा ? 
05-06-2011
1001-28-06-11
(५ जून विश्व पर्यायवरण दिवस पर) 

Thursday, March 31, 2011

आसमान निरंतर रंग बदलता

आसमान
निरंतर रंग बदलता
कभी नीला,कभी लाल दिखता
सूर्य की लालिमा
अपने में समेटता
तपन बर्दाश्त करता
ऊर्जा जग को देता
जीवन को साकार करता
कभी चाँद की चांदनी में
चमकता
तारे गहने उसके,
आभा उसकी बढाते
पंछी उड़ कर,ठहरे हुए को
गतिमान बनाते
किस्म,किस्म के बादल
रूप जीवन के दर्शाते
घनघोर काले
वर्षा से जहाँ को भिगोते
जीवन का अहसास भरते
रुई से सफ़ेद बादल
परियों के देश के लगते
हवाओं में उड़ते रहते
पृथ्वी से उठा
काला,पीला धुंआ जज्ब करता
आकाश निरंतर स्थिर रहता
चुपचाप सब सहता रहता
भावनाओं में ना बहता
31-03-03
561—231-03-11