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Thursday, March 7, 2013

जब मन दुखी कलम थकी हो


जब मन दुखी
कलम थकी हो
कैसे उम्मीदों की बात
लिखेगी
जब दिल में
दर्द की टीस उठ रही हो
कैसे किसी को खुश करेगी
खुद के ग़मों का बोझ
दूसरों के कन्धों पर
लाद देगी
उन्हें भी उनके ग़मों की
याद दिला देगी
14-14-07-01-2013
गम,दर्द ,दुःख
डा.राजेंद्र तेला,निरंत

Saturday, December 15, 2012

दर्द के खामोश समंदर



दर्द के खामोश
समंदर को
बहुत शिद्दत से
सम्हाल कर
सीने में दबा रखा है
डरता हूँ
कहीं ज़ज्बात उफन कर
बाहर ना आ जाएँ
दर्द देने वालों चेहरों को
बेनकाब ना कर दे
दुनिया को
उनकी हकीकत से
रूबरू ना करा दे
मुंह दिखाने के
लायक ही ना छोड़े
948-67-15-12-2012
शायरी,मोहब्बत,ज़ज्बात ,दर्द ,

Tuesday, December 11, 2012

क्यों किसी से मन की बात कहूँ?



क्यों  किसी से
मन की बात कहूँ?
क्या पता उसकी भी
व्यथा मेरे जैसी ही हो
क्यों किसी की
दुखती रग को छेड़ूँ
मेरी व्यथा तो कम
होगी नहीं
किसी और की व्यथा
क्यों बढाऊं?
दर्द को समझने वाले
मेरे चेहरे को देख कर ही
मनोस्थिति समझ जायेंगे
स्वयं आकर पूछ लेंगे
निदान तो नहीं कर पायेंगे
मगर दिलासा अवश्य देंगे
मन का बोझ
अवश्य कम कर देंगे
925-43-12-12-2012
मनोस्थिति, दर्द, व्यथा, दुखती रग

Tuesday, November 20, 2012

कू-ब-कू भटकता रहा



कू-ब-कू भटकता रहा
बिना दर्द के
कोई ना मिला
जिसने भी कहा
उसे दर्द नहीं
एक शख्श हँसता मिला
मैंने पूछा
क्या उसे कोई गम नहीं
नम आँखों से कहने लगा 
क्यूं मेरी बात पर
यकीं करते नहीं
कह तो रहा हूँ
मुझे कोई दर्द नहीं
कहते कहते
वो अश्क बहाने लगा
मैं भी जिद पर अड़ गया
उसके दर्द को बढ़ा दिया
फिर सवाल दाग दिया
इतना रो रहे हो
फिर भी क्यूं कहते हो
तुम्हें कोई दर्द नहीं
वो फूट फूट कर रोने लगा
सुबक सुबक कर
कहने लगा
कुछ लम्हे मन को
सुकून देने के लिए
कहता हूँ
मुझे कोई दर्द नहीं
तुमने वो भी नहीं
करने दिया    
कू-ब-कू =गली गली ,जगह जगह
852-36-20-11-2012
जीवन ,ज़िन्दगी ,दुःख,दर्द,सुकून

Sunday, November 11, 2012

तुम सुनते रहो मैं कहता रहूँगा



तुम सुनते रहो
मैं कहता रहूँगा
हाल-ऐ-दिल बयान
करता रहूँगा
जब थक जाओगे
मेरे फसानों को
सुनते सुनते
चुप हो जाओगे
मैं भी चुप हो जाऊंगा
सब्र से
दर्द सुनने वालों की
तलाश में लगा रहूँगा
842-26-11-11-2012
शायरी, हाल-ऐ-दिल,बयान ,दर्द,गम

Tuesday, July 17, 2012

अच्छा हो अब ज़ख्म ना भरे कोई


अच्छा हो अब
ज़ख्म ना भरे कोई
गुजार लिए दिन
दर्द सहते सहते कई
आदत सी पड गयी
क्यूं शौक लगाऊँ
अब नया कोई
लगा भी देगा
अगर मरहम कोई
कैसे यकीन करूँ
नया दर्द नहीं देगा
फिर कोई
इस हाल में ही खुश हूँ
बस मुस्करा देख ले
अब कोई
17-07-2012
609-06-07-12

Monday, May 28, 2012

मेरे चेहरे पर झलकता है दर्द जब



मेरे चेहरे पर
झलकता है दर्द जब
उनके चेहरे पर
मुस्काराहट आ जाती
कितनी मोहब्बत हैं
हमसे 
असलियत पता 
चल जाती
28-05-2012
538-58-05-12

Tuesday, April 17, 2012

दर्द को बुलावा ना दो


ज़ख्मों को कुरेद कर
दर्द को बुलावा ना दो
मुस्काराते चेहरों को
दिल का चारागार ना
समझो
वो कातिल-ऐ-दिल होते हैं
पहले भी खाई है चोट तुमने
कई बार देखे हैं
उनकी बेवफायी के जलवे
अब छोड़ दो
मोहब्बत का इरादा
ज़ख्मों को फिर हरा
ना होने दो
इस बार जो फँस गए
उनके जाल में
वफ़ा की उम्मीद में
कहीं जाँ से हाथ ना
धो बैठो
17-04-2012
452-32-04-12

Sunday, March 18, 2012

एक अजीब सा रिश्ता मेरा दर्द से

एक अजीब सा रिश्ता मेरा
दर्द  से
खुशी का एक पल भी नहीं
सुहाता उसे
उसकी आहट भर से ही भेष
बदल बदल कर आ जाता
कभी चोट,कभी बीमारी
अपनों की नाराजगी
कभी दुनियादारी में  
तकलीफ बन कर आ
धमकता
हंसने के लिए मुंह खोला नहीं
तुरंत अपनापन जताता
बहुत मोहब्बत दर्द को
मुझसे
कमबख्त पीछा ही नहीं
छोड़ता
अब सहने की आदत हो गयी
दोस्ती हो गयी उससे
बिना उसके अब मन भी
नहीं लगता
एक अजीब सा रिश्ता मेरा
दर्द  से
18-03-2012
397-131-03-12

Sunday, January 15, 2012

कैसे अहसान चुकाएँ तुम्हारा ?

दर्द दिए लोगों ने
तुमने हमें सुकून दिया
ज़ख्म दिए लोगों ने
तुमने मरहम लगाया
लोगों ने रास्ता
दोजख का दिखाया
तुमने फिर से हँसना
सिखाया
जीना भूल गए थे
तुमने फिर से जीना
सिखाया
जो भी सिखाया तुमने
हमने ज़िन्दगी में उतारा
जानते नहीं
कैसे अहसान चुकाएँ
तुम्हारा ?
क्या करें जो दिल का
बोझ हल्का कर दे?
अहसानों के
कर्जे को कम कर दे
हमारे सुकून में इजाफा
कर दे
अहसान फिर भी चुका
ना पायेंगे
कतरा भी ना दे पायेंगे
उसका
जितना तुमने दिया
हमको
15-01-2012
46-46-01-12


अब आँखों में आंसू भी नहीं आते

अब आँखों में
आंसू भी नहीं आते
सूख गए रोते रोते
अब दर्द भी नहीं होता
ज़ख्म
अपनों से खाते खाते
इतना सह चुके हैं
इतना टूट चुके हैं
अब फर्क नहीं पड़ता
कोई कुछ भी कहे
कोई कुछ भी करे
पहले अपनों के लिए
जीते थे
अब खुद के लिए भी
जी नहीं पाते
किसी तरह खुद को
ज़िंदा रखते
निरंतर कुछ ना कुछ
लिखते रहते
दिल के गुबार निकालते
रहते
कोई समझ ले हमको
उसे ढूंढते रहते
15-01-2012
45-45-01-12