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Saturday, November 12, 2011

क्षणिकाएं--1



पहल

आमने सामने
बैठे थे
दोनों चुप थे
पहल कौन करे
सोच में डूबे थे
******

डर

रात के डर से
दिन का उजाला
बर्बाद करते रहे
ज़िन्दगी भर
रोते रहे
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असमंजस

असमंजस
ना जीने देता
ना मरने देता
फैसला
नहीं होने देता
******

आँसूं

शरीर का 
अतरिक्त पानी
आँखों से बह कर
दिल और दिमाग का
बोझ हल्का 
करता
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निरंतर

रुके तो रुका रहे
चले तो चलता रहे
जीवन यूँ ही काटता रहे
******
हँसी

हँस तो लिए
हँसाया क्यों नहीं ?
ये भी सोचा कभी
******

12-11-2011
1781-52-11-11

Tuesday, November 8, 2011

तुम्हें कहे बिना रह भी ना पाऊँ


तुम्हें
तकलीफ भी देना
ना चाहूँ
तुम्हें कहे बिना रह भी
ना पाऊँ
हम तो सह रहे हैं
तुम्हें सहना ना पड़ें
कैसे तुम्हें अपने दर्द
बताऊँ?
कोई और समझ
नहीं सकता
सुकून दे नहीं सकता
निरंतर मन में चल रहे
असमंजस को कैसे
मिटाऊँ ?
08-11-2011
1758-26-11-11

Monday, September 5, 2011

असमंजस के भँवर

असमंजस के भँवर
मन के समुद्र में
आते रहते
शब्द मगर
मुंह से नहीं निकलते
व्यथा किस से कहें
सोचते रहते
किस पर विश्वाश करें
सवालों से झूझते रहते
दर्द का बोझ
निरंतर ढोते रहते     
04-09-2011
1443-18-09-11