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Sunday, August 5, 2012

क्या ज़माने का दस्तूर निभाते हो तुम ?



किस बात से
घबराते हो तुम
क्यूं इतना
खौफ खाते हो तुम
मुस्कारा कर मिले थे
दिल से दिल मिलाया
मन से मन मिलाया
अब पहचानते तक
नहीं हो
वो तो चाहत का
सौदा था
ये हक तो नहीं दिया था
मेरे ज़ज्बातों से खेलो
क्या ज़माने का दस्तूर
निभाते हो तुम ?
05-08-2012
654-14-08-12

अपनों ने इतना सताया उनको



कभी मिले भी नहीं
फिर  भी डरते हैं हमसे
क्यूं देख कर भी
अनदेखा करते हैं
हम कभी समझे नहीं
शायद अपनों ने
इतना सताया उनको
किसी अनजान पर
ऐतबार नहीं कर पाते
हर चेहरे पर दाग
दिखते हैं
कैसे यकीन दिलाएं
हम हज़ारों मील दूर
बैठे हैं
चाहें तो भी उनके करीब
भी नहीं पहुँच सकते
05-08-2012
651-11-08-12

Tuesday, June 5, 2012

अमावस की सर्द भयावह रात




सर्द भयावह रात
अधिक भयावह
हो जाती
जब घनघोर जंगल में
सूनी पगडंडी पर
खुद के कदमों की
पदचाप भी किसी और की
प्रतीत होती
दूर से कुत्ते के रोने की
आवाज़
निस्तब्धता भंग करती
मौत का आभास देती
तेज़ हवा में सूखे पत्ते
खड़खडा उठते
बरगद पर बैठा मोर
फडफडा कर
दूसरे पेड़ पर जा बैठता
चमकता हुआ जुगनू 
आँखों के सामने आकर 
अचानक गुम हो जाता
ह्रदय की धड़कन
क़दमों की चाल बढाता
सर्द मौसम में भी
पसीना चूने लगता
मन कामना करता
रास्ता शीघ्र समाप्त हो
आक्रान्त हो
भगवान् से प्रार्थना
करता रहता
जीवन से जुड़े हर व्यक्ति
का चेहरा
आँखों के सामने आता
रहता
मन तभी शांत होता
जब गंतव्य आ जाता
05-06-2012
573-23-06-12

Saturday, November 12, 2011

क्षणिकाएं--1



पहल

आमने सामने
बैठे थे
दोनों चुप थे
पहल कौन करे
सोच में डूबे थे
******

डर

रात के डर से
दिन का उजाला
बर्बाद करते रहे
ज़िन्दगी भर
रोते रहे
******

असमंजस

असमंजस
ना जीने देता
ना मरने देता
फैसला
नहीं होने देता
******

आँसूं

शरीर का 
अतरिक्त पानी
आँखों से बह कर
दिल और दिमाग का
बोझ हल्का 
करता
******

निरंतर

रुके तो रुका रहे
चले तो चलता रहे
जीवन यूँ ही काटता रहे
******
हँसी

हँस तो लिए
हँसाया क्यों नहीं ?
ये भी सोचा कभी
******

12-11-2011
1781-52-11-11