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Tuesday, June 5, 2012

अमावस की सर्द भयावह रात




सर्द भयावह रात
अधिक भयावह
हो जाती
जब घनघोर जंगल में
सूनी पगडंडी पर
खुद के कदमों की
पदचाप भी किसी और की
प्रतीत होती
दूर से कुत्ते के रोने की
आवाज़
निस्तब्धता भंग करती
मौत का आभास देती
तेज़ हवा में सूखे पत्ते
खड़खडा उठते
बरगद पर बैठा मोर
फडफडा कर
दूसरे पेड़ पर जा बैठता
चमकता हुआ जुगनू 
आँखों के सामने आकर 
अचानक गुम हो जाता
ह्रदय की धड़कन
क़दमों की चाल बढाता
सर्द मौसम में भी
पसीना चूने लगता
मन कामना करता
रास्ता शीघ्र समाप्त हो
आक्रान्त हो
भगवान् से प्रार्थना
करता रहता
जीवन से जुड़े हर व्यक्ति
का चेहरा
आँखों के सामने आता
रहता
मन तभी शांत होता
जब गंतव्य आ जाता
05-06-2012
573-23-06-12