कभी मिले भी
नहीं
फिर भी डरते हैं हमसे
क्यूं देख कर
भी
अनदेखा करते
हैं
हम कभी समझे
नहीं
शायद अपनों
ने
इतना सताया
उनको
किसी अनजान
पर
ऐतबार नहीं
कर पाते
हर चेहरे पर
दाग
दिखते हैं
कैसे यकीन दिलाएं
हम हज़ारों मील
दूर
बैठे हैं
चाहें तो भी
उनके करीब
भी नहीं पहुँच
सकते
05-08-2012
651-11-08-12
सर्द भयावह रात
अधिक
भयावह
हो
जाती
जब
घनघोर जंगल में
सूनी
पगडंडी पर
खुद
के कदमों की
पदचाप
भी किसी और की
प्रतीत
होती
दूर
से कुत्ते के रोने की
आवाज़
निस्तब्धता
भंग करती
मौत
का आभास देती
तेज़
हवा में सूखे पत्ते
खड़खडा
उठते
बरगद
पर बैठा मोर
फडफडा
कर
दूसरे
पेड़ पर जा बैठता
चमकता
हुआ जुगनू
आँखों
के सामने आकर
अचानक गुम हो जाता
ह्रदय
की धड़कन
क़दमों
की चाल बढाता
सर्द
मौसम में भी
पसीना
चूने लगता
मन
कामना करता
रास्ता
शीघ्र समाप्त हो
आक्रान्त
हो
भगवान्
से प्रार्थना
करता
रहता
जीवन
से जुड़े हर व्यक्ति
का
चेहरा
आँखों
के सामने आता
रहता
मन
तभी शांत होता
जब
गंतव्य आ जाता
05-06-2012
573-23-06-12