187-02-11
मानस
पटल से हटता नहीं
द्रश्य वर्षों पुराना
गगन ऊपर नीला
पहाड़ की चोटियों से
अठखेलियाँ कर रहे
रुई से सफ़ेद बादलों
से भरा
नीचे नदी कल कल
बह रही
स्वच्छ.निर्मल जल
आगे ले जा रही
सफ़ेद भेड़ें हरी घास में
चर रही
नदी,और आकाश
के बीच
पहाड़ पर संगीत की
महफ़िल सजी हुयी
चरवाहा बांसुरी
बजा रहा
संगीत और सुर की
सरिता बहा रहा
कोयल पेड़ पर बैठी
कूंक रही
मैना भी कुछ कुछ
कह रही
काम साजिंदों का
निभा रही
धरती पर स्वर्ग का
आभास "निरंतर" हो रहा
आज वर्षों बाद
लौटा हूँ
नाम वही,जगह वही
नदी वही,पहाड़ वही
द्रश्य सारा बदल गया
नदी की धारा
मटमैली हो गयी
नदी किनारे घास
पीली पड गयी
आस पास
कारखाने बन गए
चिमनियों से धुंआ
उगल रहे
आकाश का नीलापन
धुंधला गया
पेड़ कम हो गये
कोयल,मैना की
आवाज़ खो गयी
चरवाहा भेड़ों को बेच
कारखाने में काम
करने लगा
अहसास हो गया
यहाँ भी आदमी
के साथ
मशीन का आगमन
हो गया
विकास का तमगा
लग गया
विकास के नाम पर
इंसान परमात्मा के
वरदान से
छेड़ छाड़ कर रहा
कीमत उस की
चुका रहा
स्वर्ग से दूर
जा रहा
03-02-2011