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Tuesday, May 15, 2012

खून जब बन जाता है पानी

बन जाता है पानी
मर्यादाएं
हो जाती हैं ध्वस्त
संतान
निकम्मी हो जाती
प्रताड़ित
करती माँ बाप को
रोती है धरती
रोता है आकाश
रोते हैं माँ बाप
कोसते हैं किस्मत को
क्यों जन्म दिया
ऐसी संतान को
निसंतान होने का दुःख
इतना भीषण तो
नहीं होता
खुद का खून जहर
बन कर
पल पल जान तो
नहीं लेता
14-05-2012
521-41-05-12

Sunday, February 12, 2012

अच्छा हुआ जो फूल के रूप में पैदा नहीं हुआ

बचपन से ही
फूल मुझे बहुत पसंद हैं
पर पहले सोचता था
कितना अच्छा भाग्य होता
फूलों का
हर आदमी उन्हें चाहता
उनकी सुगंध से
मदमस्त हो जाता
इश्वर को
या अन्य  किसी को भी
सम्मान रूप भेंट किया जाता 
मन में सवाल आता
इश्वर ने फूल के रूप में
क्यों जन्म नहीं दिया
क्यों मुझे इंसान बनाया
अब सोचता हूँ
इंसान के रूप में ही ठीक हूँ
अच्छा हुआ जो फूल के रूप में
पैदा नहीं हुआ
जो भी खूबसूरत फूल खिलता
भंवरों से बच भी जाए
किसी ना किसी हाथ द्वारा
नोंच लिया जाता
माला बनाने के लिए सुई से
बींध दिया जाता
समारोह पूरा होते ही
फैंक दिया जाता
पैरों तले  रौंद दिया जाता
मौत आने से पहले ही
कई बार मार दिया जाता
सुन्दर दिखना और महकना ही
काफी नहीं होता
कष्ट में जीवन जीना पड़े चाहे
पर परमात्मा से
बुलावा आने पर ही
सम्मान पूर्वक
संसार से जाना चाहता
किसी के हाथों बेरहमी से
कुचला और मारा नहीं
जाना चाहता 
12-02-2012
155-66-02-12

Thursday, November 24, 2011

नीम की इच्छा


घर के
आँगन में बरसों से
खडा नीम का पेड़
अब बूढा होने लगा था
परमात्मा से
प्रार्थना में लीन था
कह रहा था
प्रभु कुछ ऐसा कर दे
इंसान सा
ना मरना पड़े मुझे
उम्र बीत गयी घर में
लोगों को
जन्म लेते फिर जाते
देखते
हँसते चेहरे कैसे
मुरझा जाते ?
निरंतर
बीमारी से झूझते झूझते
तिल तिल कर मर जाते
मरने से पहले ही
बार बार बार मरते
मुझे पता है
सबको जाना इक दिन
कुल्हाड़ी से कटवा देना
पर ऐसे तो ना भेजना
फिर जन्म लेने का
मन ही ना करे 
23-11-2011
1811-82-11-11

Friday, July 22, 2011

सोच से कोई नहीं जन्मा

सोच से
कोई नहीं जन्मा
हर जन्म
मिलन का नतीजा
कभी इच्छा,
कभी मजबूरी कारण
जब आ गया
संसार में
खुद भी वही करेगा
जो औरों ने किया
कभी मंजूरी से
कभी मजबूरी में
निरंतर

नए जीवन का
उदय करेगा
21-07-2011
1212-92-07-11

Tuesday, June 21, 2011

जन्म लेने वाला ,जन्म देने वाले से बड़ा नहीं होता

धरती में
बीजारोपण हुआ
बीज अंकुरित हुआ
पल्लवित हुआ
पौधा पनपने लगा 
पत्तियों से भर गया 
एक कली खिली
फूल का जन्म हुआ
सौन्दर्य और महक से
सब को लुभाने लगा
आकर्षण का केंद्र
अब पौधा नहीं फूल था
घमंड में फूल इतराने लगा
पौधे और पत्तियों को
भूल गया
निरंतर अहम् में 
रहने लगा
अहंकार में पत्तियों से
बात करना बंद कर दिया 
पौधा व्यथित होता रहा
नादानी 
समझ सहता रहा
समय के अंतराल में
पौधा मुरझा गया
फूल का भी अंत हुआ
समझ नहीं सका
अचानक क्या हुआ ?
भूल गया था
उसका सौन्दर्य 
पौधे की देन था
पौधा ही पालनहार था
पौधा ही उसके अस्तित्व
का कारण था
वो मात्र एक अंग था
चाहे संतान कितनी भी
ऊंचाइयां ले ले
जन्म लेने वाला
जन्म देने वाले से
बड़ा नहीं होता
21-06-2011
1080-107-06-11