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Sunday, January 15, 2012

कल कह ना सकूं

कल कह ना सकूं
दिल की बात आज ही
कहना चाहता हूँ
रात सोऊँ सवेरे उठ
ना पाऊँ
इस तरह दुनिया से
रुखसत होना चाहता हूँ 
सबको हँसते गाते
छोड़ कर जाना चाहता हूँ 
जानता हूँ जब भी कोई
अपना जाता
दिल कितना रोता है
किसी अपने को
रुलाना नहीं चाहता हूँ
याद कर
आंसू ना बहाए कोई
जाने के बाद किसी को
याद नहीं आऊँ
ज़िन्दगी के सफ़र में
मिला था मुसाफिर कोई
समझ कर
भुला दिया जाऊं
दुखाया हो
दिल किसी का कभी
हुयी हो गलती कोई
तो जीते जी
माफ़ कर दिया जाऊं  
जाने के बाद
दिल किसी का दुखाना
नहीं चाहता हूँ
दे नहीं सका खुशी जिन्हें
उन्हें खुश देखना
चाहता हूँ
बना ना सका अपना
जिन्हें 
उन्हें अपना बनाना
चाहता हूँ
बचे वक़्त का हर लम्हा
दूसरों के लिए जीना
चाहता हूँ
 जो चाहता है मुझे 
मिल नहीं सका जिससे
उससे मिलना
चाहता हूँ
कल कह ना सकूं
दिल की बात आज ही
कहना चाहता हूँ
सुकून से जाना
चाहता हूँ   
15-01-2012
43-43-01-12

Thursday, November 24, 2011

नीम की इच्छा


घर के
आँगन में बरसों से
खडा नीम का पेड़
अब बूढा होने लगा था
परमात्मा से
प्रार्थना में लीन था
कह रहा था
प्रभु कुछ ऐसा कर दे
इंसान सा
ना मरना पड़े मुझे
उम्र बीत गयी घर में
लोगों को
जन्म लेते फिर जाते
देखते
हँसते चेहरे कैसे
मुरझा जाते ?
निरंतर
बीमारी से झूझते झूझते
तिल तिल कर मर जाते
मरने से पहले ही
बार बार बार मरते
मुझे पता है
सबको जाना इक दिन
कुल्हाड़ी से कटवा देना
पर ऐसे तो ना भेजना
फिर जन्म लेने का
मन ही ना करे 
23-11-2011
1811-82-11-11

Tuesday, March 22, 2011

उनकी किसी चीज़ को नहीं छेड़ता



वो अब
नहीं दुनिया में
फिर भी हैं पास मेरे
कमरे में जिस्म से नहीं
मगर अहसास से साथ मेरे
पर्दों से लेकर दीवारों में बसतीं 
बिस्तर की सलवटें,
तकिये पर कुछ बाल उनके
अब भी साथ मेरे
पहने अनपहने कपडे,
सौन्दर्य प्रसाधन
उन्हें मुझ से दूर ना होने देते
उनका चश्मा,पसंदीदा किताबें
अब भी उनकी चाहत दर्शाती
लगता कोई पसंद की पंक्ति
अब सुनाने वाली
चाबियों का झुमका,
बड़ा सा पर्स,सुन्दर चप्पलें
बाहर चलने का आमंत्रण देती
उनकी बातें कानों में गूंजती
हर चीज़ उनकी खुशबू से
महकती  
कभी प्यार जताना
कभी प्यार से झिडकना
कहाँ भूलता
कमरे में रहना मुझे अच्छा लगता
हर तरफ उन्हें पाता
जिस्म से तो दूर हुयीं
रूह से दूर ना जाएँ
निरंतर कामना करता
जो चीज़ जैसी रख कर गयीं
 वैसे ही रहने देता
डरता हूँ, छेड़ने पर नाराज़ हो
कमरे से ना चले जाएँ
इस लिए उनकी
किसी चीज़ को नहीं
छेड़ता
23-03-03
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
476—146-03-11

जीविकोपार्जन के लिए,कब तक ये सब करना पडेगा



आज फिर
परमात्मा से प्रार्थना
करते करते
बेमन से काम पर 
निकला
वीभत्स,विकृत,
दुर्घटना में क्षत विक्षत,
बूढ़े, जवान ,मासूम
असमय काल कवलित
चेहरों को
नहीं देखना पड़े
ऐसा कुछ कर दे
चाक़ू से बेतरतीब
कटे हुए जिस्मों को
मोटे सुए से
फिर किसी शव को
बोरी सा नहीं सिलना पड़े
मौत का कारण जानने
के लिए
उनके अवशेषों को
बोतलों में भरते भरते
जीवन से विमुख हो गया
जमे हुए काले पड़े हुए
खून से सने कमरे को
साफ़ करते करते थक गया
कातिल नहीं था
मगर ये सब करते,करते
खुद को
कातिल समझने लगा
जीना दुश्वार लगने लगा
खुद से भी नफरत
होने लगी
नहीं जानता ,
जीविकोपार्जन के लिए
 कब तक ये सब करना
पडेगा
उसके पास कोई और
चारा ना था
मुर्दा घर में सफाई
कर्मचारी था
पोस्ट मार्टम करवाता था
जीने के लिए
निरंतर मरे हुओं को
 मारता था
22-03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
470—140-03-11