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Friday, November 23, 2012

जब बीमार की सांस रुकने लगी



जब बीमार की सांस
रुकने लगी
दिल की धड़कन बंद
होने लगी
पास बैठे अपने पराये
बीमार की चिंता छोड़ कर
खुद की चिंता करने लगे
कभी उनके साथ भी
ऐसा ही होगा
सोच कर घबराने लगे
परमात्मा से
लम्बे जीवन की प्रार्थना
करने लगे
अपने दुशकर्मों की क्षमा
मांगने लगे
अगले दिन बीमार ने
संसार छोड़ दिया
परमात्मा ने
क्षमा कर दिया होगा
सोच कर लोगों ने
चिंता करना छोड़ दिया
फिर से वही करने लगे
जिसके लिए
कल क्षमा मांग रहे थे
861-45-23-11-2012
जीवन,ज़िन्दगी,मौत,चिंता,प्रार्थना,परमात्मा

Wednesday, November 21, 2012

अनबूझा संसार



निस्तब्ध हूँ
निश्चल हूँ
कोई पीड़ा नहीं
कोई वेदना नहीं
ना खुश हूँ
ना दुखी हूँ
भावना रहित हूँ
कोई दोस्त नहीं
कोई दुश्मन नहीं
कोई अपना नहीं
कोई पराया नहीं
कोई सोच नहीं
कोई इच्छा नहीं
कष्टों से मुक्त हूँ
धरती से दूर
एक अनबूझे
संसार में हूँ 
मैं मृत हूँ
853-37-21-11-2012
जीवन ,ज़िन्दगी ,अनबूझा संसार,मृत्यु,मृत,मौत


Sunday, January 15, 2012

कल कह ना सकूं

कल कह ना सकूं
दिल की बात आज ही
कहना चाहता हूँ
रात सोऊँ सवेरे उठ
ना पाऊँ
इस तरह दुनिया से
रुखसत होना चाहता हूँ 
सबको हँसते गाते
छोड़ कर जाना चाहता हूँ 
जानता हूँ जब भी कोई
अपना जाता
दिल कितना रोता है
किसी अपने को
रुलाना नहीं चाहता हूँ
याद कर
आंसू ना बहाए कोई
जाने के बाद किसी को
याद नहीं आऊँ
ज़िन्दगी के सफ़र में
मिला था मुसाफिर कोई
समझ कर
भुला दिया जाऊं
दुखाया हो
दिल किसी का कभी
हुयी हो गलती कोई
तो जीते जी
माफ़ कर दिया जाऊं  
जाने के बाद
दिल किसी का दुखाना
नहीं चाहता हूँ
दे नहीं सका खुशी जिन्हें
उन्हें खुश देखना
चाहता हूँ
बना ना सका अपना
जिन्हें 
उन्हें अपना बनाना
चाहता हूँ
बचे वक़्त का हर लम्हा
दूसरों के लिए जीना
चाहता हूँ
 जो चाहता है मुझे 
मिल नहीं सका जिससे
उससे मिलना
चाहता हूँ
कल कह ना सकूं
दिल की बात आज ही
कहना चाहता हूँ
सुकून से जाना
चाहता हूँ   
15-01-2012
43-43-01-12

Tuesday, November 8, 2011

एक की मौत दूसरे का जश्न बनी


किसी की जान गयी
दुनिया से मुक्ती मिली
किसी की ईद मनी
मन की मुराद पूरी हुयी
किसी के आंसू
किसी की हँसी बनी 
एक की मौत दूसरे का
जश्न बनी
पर दुनिया की रीत
नहीं बदली
निरंतर गम और खुशी
साथ चलती रही
अमृत और ज़हर की
दुश्मनी ख़त्म नहीं हुयी
ज़िन्दगी और मौत में
आँख मिचोली
होती रही
07-11-2011
1754-22-11-11

Wednesday, July 13, 2011

दोनों की मजबूरी थी

घर में मौत हो गयी
दिलों में गमी छा गयी
पड़ोस में शादी की
शहनाई बज रही
इधर रोना धोना हो रहा 
उधर नाच गाना हो रहा
दोनों की मजबूरी थी
उनके लिए रोना ज़रूरी
इनके लिए गाना ज़रूरी
जिसकी शादी थी
वो खुशी से पागल थी
जिसकी मौत हुयी
वो खामोश लेटी थी
दोनों की मजबूरी थी
इधर तीसरे की बैठक
हो रही
उधर डोली सज़ रही
इधर बैठक उठी
उधर डोली उठी
दोनों तरफ आँखें
नम थी
दोनों की मजबूरी थी
13-07-2011
1176-59-07-11

Sunday, April 17, 2011

उनको भी एक दिन जाना है ,क्यूं इंसान निरंतर भूलता

पड़ोसी का निधन हुआ
भारी ह्रदय से 
दाह संस्कार में शामिल हुआ
दाह संस्कार होने  तक
लोगों की बातें सुनता रहा
कार्य कलाप देखता रहा
मन में व्यथित होता रहा
कोई हाल चाल पूंछ रहा
कोई मोबाइल पर बतिया रहा
किसी को घर जाने की जल्दी
कोई हंसी मज़ाक में व्यस्त
कोई मृतक के गुणगान
कर रहा
कोई बुराइयां बता रहा
किसी को
उसके धन की चिंता
किस को कितना मिलेगा
हिसाब किताब  कर रहा
मृतक के
संसार से जाने का दुःख कम
मौत पर
शामिल होने  की  रस्म
निभाना बाकी रह गया 
उनको भी एक दिन जाना है
क्यूं इंसान निरंतर भूलता
17-04-2011
690-114-04-11

Tuesday, March 22, 2011

जीविकोपार्जन के लिए,कब तक ये सब करना पडेगा



आज फिर
परमात्मा से प्रार्थना
करते करते
बेमन से काम पर 
निकला
वीभत्स,विकृत,
दुर्घटना में क्षत विक्षत,
बूढ़े, जवान ,मासूम
असमय काल कवलित
चेहरों को
नहीं देखना पड़े
ऐसा कुछ कर दे
चाक़ू से बेतरतीब
कटे हुए जिस्मों को
मोटे सुए से
फिर किसी शव को
बोरी सा नहीं सिलना पड़े
मौत का कारण जानने
के लिए
उनके अवशेषों को
बोतलों में भरते भरते
जीवन से विमुख हो गया
जमे हुए काले पड़े हुए
खून से सने कमरे को
साफ़ करते करते थक गया
कातिल नहीं था
मगर ये सब करते,करते
खुद को
कातिल समझने लगा
जीना दुश्वार लगने लगा
खुद से भी नफरत
होने लगी
नहीं जानता ,
जीविकोपार्जन के लिए
 कब तक ये सब करना
पडेगा
उसके पास कोई और
चारा ना था
मुर्दा घर में सफाई
कर्मचारी था
पोस्ट मार्टम करवाता था
जीने के लिए
निरंतर मरे हुओं को
 मारता था
22-03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
470—140-03-11