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Wednesday, April 6, 2011

ये ना समझना कि मोहब्बत की आग बुझ गयी


मेरी खामोशी का
मतलब
ये ना समझना कि
मोहब्बत
की आग बुझ गयी
ये बात जुदा है कि
अब उसे
दबाना सीख लिया
अब दोस्ती ग़मों से
कर ली
साथ उनके जीना
सीख लिया
अश्क भी आते हैं ,
मुझे रुलाते हैं
वो भी निरंतर उनके
गम में
आने से पहले ही
सूख जाते हैं
06-04-2011
615-48 -04-11

Friday, March 25, 2011

ना मारो खुद को पल पल,हर पल जिया करो



कौन है,
जिसने ख्वाब नहीं देखे ?
कुछ पूरे हुए,कुछ अधूरे रहे
फिर क्यों इंसान 
निरंतर रोता रहता
जो बीत गया 
उसमें खोता रहता
भविष्य की चिंता में 
घुलता रहता
वर्तमान में दुखी रहता
जो मिला अब तक जानो उसे
धन्यवाद इश्वर को दो
बेहतर की उम्मीद करो
बोझ ना उसका मन में रखो
मिले ना मिले, 
मर्जी खुदा की समझो 
ना मारो खुद को पल पल
हर पल जिया करो
सन्देश दुनिया को भी 
दिया करो
25-03-03
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
504—174-03-11

Tuesday, March 22, 2011

जीविकोपार्जन के लिए,कब तक ये सब करना पडेगा



आज फिर
परमात्मा से प्रार्थना
करते करते
बेमन से काम पर 
निकला
वीभत्स,विकृत,
दुर्घटना में क्षत विक्षत,
बूढ़े, जवान ,मासूम
असमय काल कवलित
चेहरों को
नहीं देखना पड़े
ऐसा कुछ कर दे
चाक़ू से बेतरतीब
कटे हुए जिस्मों को
मोटे सुए से
फिर किसी शव को
बोरी सा नहीं सिलना पड़े
मौत का कारण जानने
के लिए
उनके अवशेषों को
बोतलों में भरते भरते
जीवन से विमुख हो गया
जमे हुए काले पड़े हुए
खून से सने कमरे को
साफ़ करते करते थक गया
कातिल नहीं था
मगर ये सब करते,करते
खुद को
कातिल समझने लगा
जीना दुश्वार लगने लगा
खुद से भी नफरत
होने लगी
नहीं जानता ,
जीविकोपार्जन के लिए
 कब तक ये सब करना
पडेगा
उसके पास कोई और
चारा ना था
मुर्दा घर में सफाई
कर्मचारी था
पोस्ट मार्टम करवाता था
जीने के लिए
निरंतर मरे हुओं को
 मारता था
22-03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
470—140-03-11

Sunday, March 20, 2011

हार में भी जीत का मज़ा मिलेगा,होगा वही जो मंजूरे खुदा होगा


कारवाँ
तो बनाया मैंने  
मंजिल तक पहुँच ना सके
सफ़र में साथ जो थे मेरे
एक एक कर साथ
छोड़ते गए
अब जो बचे साथ मेरे
हिम्मत हारने लगे
कोई लाचार जिस्म से
कोई परेशाँ नाकामयाबी से
फिर भी लड़ता जाता,हालात से
जज्बा निरंतर पैदा करता
मंजिल रोज़ याद दिलाता
कामयाबी मकसद नहीं
किसी सफ़र का
ये भी समझाता जाता
मंजिल मिले ना मिले
चाहे हार जाओ आखिर में
हर हाल में लड़ने की
कोशिश ज़रूरी
इत्मानान रहेगा मेहनत
पूरी करी
हार में भी जीत का
मज़ा मिलेगा
होगा वही जो मंजूरे
खुदा होगा
20-03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
460—130-03-11

अच्छा हुआ अब बात नहीं करते




अच्छा हुआ
अब बात नहीं करते

जैसा सोचा वैसा ही करते 
निरंतर हंसी ठिठोली करता
सब के सामने अपनापन
दिखाता
दिल की बातें उनसे कहता
इरादे नापाक मेरे
ऐसा अहसास देता
कोई उंगली उठाए रिश्तों पर
इंतज़ार उसका करता
अब कामयाब हो गया
उन्होंने मुंह फिरा लिया
बात करना अब बंद
कर दिया
अपनी नज़रों से गिरा दिया
अब कोई ऊंगली ना
उठाएगा
वजूद जिसका नहीं
उस रिश्ते से ना जोड़ेगा
बोझ दिल का उनके
कम किया
चाहत के खातिर काम
ऐसा किया 
इसी में सुकून हासिल
किया
20-03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
458—128-03-11

मेरी हसरतें अभी मिटी नहीं


मेरी हसरतें अभी
मिटी नहीं
उन्हें पाने की ख्वाइश
कम हुयी नहीं
हाँ उन्होंने अब तक
भरी  नहीं
अब भी इस शहर में
रहतीं
लोगों को बाज़ार में
नज़र जातीं
सुना है,ना हंसती ना
मुस्कराती
वो भी खुश नहीं,अंदाज़
कराती
उनकी नाखुशी सुकून
मुझको देती
अब तक किसी की
हुयी नहीं
अहसास कराती
निरंतर ऐसी खबरें
उम्मीद मेरी कायम
रखतीं
20-03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
455—125-03-11