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Wednesday, May 4, 2011

हंसना ना छोड़ा

ना दिल से
रिश्तों का भ्रम टूटा
ना कसमों,वादों से
यकीन उठा
गैरों  की ज़रुरत
नहीं पडी
अपनों से धोखा
बहुत खाया
कई बार भीगा
ग़मों की बरसात में
हर बार रोया
अपनी किस्मत पे
मगर
हंसना ना छोड़ा
हर बार
उठ खडा हुआ
नए ज़ज्बे से
मिरंतर लड़ता रहा
खुदा से
दुआ करता रहा
यकीन
खुद पर रखता रहा 
04-05-2011
805-12-05-11

Saturday, April 23, 2011

बदलनी है तो मेरी फितरत बदल


इल्तजा
खुदा से करता
मुझे ना बदलना 
बदलनी है तो
मेरी फितरत बदल
नफरत को प्यार में
बदल
अन्दर पल रही
निराशा को बदल
मेरे ख्यालों को बदल
उन्हें
उम्मीदों से भर 
मेरे चेहरे का नक्शा
बदल
उसे हंसी और
मुस्कराहट से भर
निरंतर सब को खुश
रख सकूं
जहन को
ऐसे जज्बे से भर
23-04-2011
742-162-04-11

Wednesday, April 20, 2011

जोश


रेगिस्तान
का मुसाफिर हूँ
धूल आंधी में जीता हूँ
बियाबान दुनिया है
दूर तक हरयाली नहीं
दूर से रेत के धोरे आस
जगाते
पास पहुंचता तब तक
हवा में उड़ जाते
मरिचिकाओं में पानी
ढूंढता हूँ
हर बार प्यासा रहता  हूँ
फिर भी निरंतर चलता
रहता
कहीं कैक्टस नज़र आता
हरीतिमा का अहसास
 होता
मन में आशा जगाता
सफ़र पूरा करना है
मन में ठान
दुगने जोश से चल
पड़ता हूँ 
20-04-2011
713-136-04-11

Monday, April 18, 2011

कल फिर हंसता हुआ मिलूंगा

कई बार
ज़िन्दगी में लड़ा हूँ
हर बार रोकर हंसा हूँ
कब तक सहना पडेगा
कब तक लड़ना पडेगा
पता मुझे नहीं
बवंडर रोज़ आते
कोशिश उड़ाने की करते
ठान कर बैठा हूँ
हार नहीं मानूंगा 
कमज़ोर जरूर हुआ हूँ 
मगर थका नहीं हूँ
निरंतर अपनों ने
जलाया मुझ को
मगर जला नहीं हूँ
हर बार
बच कर निकला हूँ
इस बार भी बच कर
निकल जाऊंगा
कल फिर हंसता हुआ
मिलूंगा   
18-04-2011
701-124-04-11

Monday, April 11, 2011

निरंतर,आगे बढूंगा


बहुत बहक चुका
बहुत चहक चुका
बहुत सह चुका
कभी क्रोधित हुआ
कभी खुश हुआ
अब थक गया
अब चुप रहूँगा
खुद से बात
करूंगा
मंथन विचारों का
करूंगा 
भूल सुधारूँगा
नए जज्बे से फिर
चलूँगा
निरंतर,आगे
बढूंगा
11-04-2011
650-83-04-11

Wednesday, March 30, 2011

इंसान कमज़ोर या तगड़ा,बिना गुण किसी को ना भाता


फूल
एक पंखुड़ी का हो
या सैकड़ों पंखुड़ियों का
फूल कहलाता 
निरंतर लुभाता
सदा महकता
इंसान
कमज़ोर या तगड़ा
बिना गुण
किसी को ना भाता
गुण एक या अनेक
इंसान के लिए ज़रूरी
सुधार की कोशिश ज़रूरी
जज्बा अगर ठीक हो
गुण बढ़ते जाएँगे
कमजोर मज़बूत होते
जाएँगे
क्यों ना ठान लें ?
अवगुणों को दूर करना
गुणों को हांसिल करना
सब को यही सिखाना
नए सफ़र पर चलना
नवजीवन प्रारम्भ करना
ध्येय अब बनाना है
30-03-03
556—226-03-11
   

Tuesday, March 29, 2011

जज्बा बदलो

जून का महीना था,
गर्मी से परेशान था
पंखा भी मरता सा
चल रहा था,
कर्र कर्र की आवाज़ से
निस्तब्धता भंग कर
रहा था
थोड़ी थोड़ी देर में रुकता था
मैं हाथ में
दादाजी की बैंत लिए बैठा था
पंखे के रुकते ही,पंखुड़ियों को
बैंत से ठेलता,
पंखा फिर चल पड़ता,
ना सो पाता,ना जाग पाता
मेरे एक मित्र का आना हुआ
आते ही उसने हाथ में
बैंत रखने का कारण पूछा
उसे सारा वाकया बताया
वो जोर से हंसा और बोला
निरंतर सुस्ती छोडो,
जज्बा बदलो
नहीं तो गर्मी झेलते रहोगे
पंखे को
बैंत से ठेलना बंद करो
कल का काम आज करो
उठो पंखा ठीक कराओ
कर्र कर्र से मुक्ती पाओ
ठंडी हवा खाओ
29-03-03
537—207-03-11
  (जज्बा =Attitude= रवैया)