निरंतर कुछ सोचता रहे,कुछ करता रहे,कलम के जरिए बात अपने कहता रहे.... (सर्वाधिकार सुरक्षित) ,किसी की भावनाओं को ठेस पहुचाने का कोई प्रयोजन नहीं है,फिर भी किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचे तो क्षमा प्रार्थी हूँ )
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Wednesday, May 4, 2011
Saturday, April 23, 2011
Wednesday, April 20, 2011
जोश
रेगिस्तान
का मुसाफिर हूँ
धूल आंधी में जीता हूँ
बियाबान दुनिया है
दूर तक हरयाली नहीं
दूर से रेत के धोरे आस
जगाते
पास पहुंचता तब तक
हवा में उड़ जाते
मरिचिकाओं में पानी
ढूंढता हूँ
हर बार प्यासा रहता हूँ
फिर भी निरंतर चलता
रहता
कहीं कैक्टस नज़र आता
हरीतिमा का अहसास
होता
मन में आशा जगाता
सफ़र पूरा करना है
मन में ठान
दुगने जोश से चल
पड़ता हूँ
20-04-2011
713-136-04-11
Monday, April 18, 2011
कल फिर हंसता हुआ मिलूंगा
कई बार
ज़िन्दगी में लड़ा हूँ
हर बार रोकर हंसा हूँ
कब तक सहना पडेगा
कब तक लड़ना पडेगा
पता मुझे नहीं
बवंडर रोज़ आते
कोशिश उड़ाने की करते
ठान कर बैठा हूँ
हार नहीं मानूंगा
कमज़ोर जरूर हुआ हूँ
मगर थका नहीं हूँ
निरंतर अपनों ने
जलाया मुझ को
मगर जला नहीं हूँ
हर बार
बच कर निकला हूँ
इस बार भी बच कर
निकल जाऊंगा
कल फिर हंसता हुआ
मिलूंगा
18-04-2011
701-124-04-11
Monday, April 11, 2011
निरंतर,आगे बढूंगा
बहुत बहक चुका
बहुत चहक चुका
बहुत सह चुका
कभी क्रोधित हुआ
कभी खुश हुआ
अब थक गया
अब चुप रहूँगा
खुद से बात
करूंगा
मंथन विचारों का
करूंगा
भूल सुधारूँगा
नए जज्बे से फिर
चलूँगा
निरंतर,आगे
बढूंगा
11-04-2011
650-83-04-11
Wednesday, March 30, 2011
इंसान कमज़ोर या तगड़ा,बिना गुण किसी को ना भाता
फूल
एक पंखुड़ी का हो
या सैकड़ों पंखुड़ियों का
फूल कहलाता
निरंतर लुभाता
सदा महकता
इंसान
कमज़ोर या तगड़ा
बिना गुण
किसी को ना भाता
गुण एक या अनेक
इंसान के लिए ज़रूरी
सुधार की कोशिश ज़रूरी
जज्बा अगर ठीक हो
गुण बढ़ते जाएँगे
कमजोर मज़बूत होते
जाएँगे
क्यों ना ठान लें ?
अवगुणों को दूर करना
गुणों को हांसिल करना
सब को यही सिखाना
नए सफ़र पर चलना
नवजीवन प्रारम्भ करना
ध्येय अब बनाना है
30-03-03
556—226-03-11
Tuesday, March 29, 2011
जज्बा बदलो
जून का महीना था,
गर्मी से परेशान था
गर्मी से परेशान था
पंखा भी मरता सा
चल रहा था,
कर्र कर्र की आवाज़ से
निस्तब्धता भंग कर
रहा था
थोड़ी थोड़ी देर में रुकता था
मैं हाथ में
मैं हाथ में
दादाजी की बैंत लिए बैठा था
पंखे के रुकते ही,पंखुड़ियों को
बैंत से ठेलता,
पंखे के रुकते ही,पंखुड़ियों को
बैंत से ठेलता,
पंखा फिर चल पड़ता,
ना सो पाता,ना जाग पाता
मेरे एक मित्र का आना हुआ
आते ही उसने हाथ में
ना सो पाता,ना जाग पाता
मेरे एक मित्र का आना हुआ
आते ही उसने हाथ में
बैंत रखने का कारण पूछा
उसे सारा वाकया बताया
वो जोर से हंसा और बोला
उसे सारा वाकया बताया
वो जोर से हंसा और बोला
निरंतर सुस्ती छोडो,
पंखे को
बैंत से ठेलना बंद करो
कल का काम आज करो
उठो पंखा ठीक कराओ
कर्र कर्र से मुक्ती पाओ
ठंडी हवा खाओ
कल का काम आज करो
उठो पंखा ठीक कराओ
कर्र कर्र से मुक्ती पाओ
ठंडी हवा खाओ
29-03-03
537—207-03-11
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