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Tuesday, March 22, 2011

क्यों सोचते,सब समझते हो तुम?



क्यों सोचते सब
समझते हो तुम
सब से
बुद्धिमान हो तुम
सब  से ज्यादा
आता तुम्हें
सारी अच्छाई
तुम में है
सब से श्रेष्ठ हो तुम
निरंतर मुखालते में
रहते हो तुम
सिर्फ अहम् से
भरे हो तुम
नाश अपना
कर रहे हो तुम
अपने अन्दर
कभी झांको तो सही
सवाल खुद से भी
कभी करो तो सही
उत्तर तुम्हें मिलेगा
ज़रूर
शर्म से सर झुकेगा
फिर ना कहोगे
कभी
तुमसे बेहतर
कोई नहीं
23-03-03
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
478—148-03-11

उनकी किसी चीज़ को नहीं छेड़ता



वो अब
नहीं दुनिया में
फिर भी हैं पास मेरे
कमरे में जिस्म से नहीं
मगर अहसास से साथ मेरे
पर्दों से लेकर दीवारों में बसतीं 
बिस्तर की सलवटें,
तकिये पर कुछ बाल उनके
अब भी साथ मेरे
पहने अनपहने कपडे,
सौन्दर्य प्रसाधन
उन्हें मुझ से दूर ना होने देते
उनका चश्मा,पसंदीदा किताबें
अब भी उनकी चाहत दर्शाती
लगता कोई पसंद की पंक्ति
अब सुनाने वाली
चाबियों का झुमका,
बड़ा सा पर्स,सुन्दर चप्पलें
बाहर चलने का आमंत्रण देती
उनकी बातें कानों में गूंजती
हर चीज़ उनकी खुशबू से
महकती  
कभी प्यार जताना
कभी प्यार से झिडकना
कहाँ भूलता
कमरे में रहना मुझे अच्छा लगता
हर तरफ उन्हें पाता
जिस्म से तो दूर हुयीं
रूह से दूर ना जाएँ
निरंतर कामना करता
जो चीज़ जैसी रख कर गयीं
 वैसे ही रहने देता
डरता हूँ, छेड़ने पर नाराज़ हो
कमरे से ना चले जाएँ
इस लिए उनकी
किसी चीज़ को नहीं
छेड़ता
23-03-03
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
476—146-03-11

हर छोटी चीज़,छोटी नहीं होती



बूँद पानी की
आँखों से निकले
अश्क कहलाती
हाल-ऐ-दिल बयाँ
करती
सीप में रूप मोती का
लेती
प्यासे के मुंह में गिरे
प्यास उसकी बुझाती
गर जिस्म से टपके
अहसास मेहनत का
कराती
पेशानी पर छलके तो
परेशानी मन की
बताती
छोटी होते हुए भी
निरंतर कारनामे बड़े
करती
रास्ता कामयाबी का
दिखाती
जज्बा हो तो
मंजिल दूर नहीं होती
हर छोटी चीज़,
छोटी नहीं होती  

23-03-03
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
475—145-03-11

काश हर शख्श के जहन में,इक अक्स होता




काश
हर शख्श के जहन में
इक अक्स होता
क्या सोचता
दुनिया को दिखता
सारा झंझट ख़त्म
होता
न किसी का चेहरा,
दोहरा होता
ना कोई जुबान से
कुछ 
दिल से  कुछ और
कहता
निरंतर प्यार का
बोलबाला होता 
नफरत का कोई स्थान
ना होता
23-03-03
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
474—144-03-11