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Wednesday, August 17, 2011

उनकी ख़ूबसूरती दिल को छूती

उनकी

ख़ूबसूरती

दिल को छूती

चुनिन्दा लफ्जों की

ग़ज़ल लगती
हर पंक्ती

दिल को छूती
मन करता कुछ
पंक्तियाँ चुरा लूं
कुछ लफ्ज

मेरे मिला दूँ
एक नयी

ग़ज़ल बना लूँ
उस ग़ज़ल को मेरी

कह दूँ
निरंतर गाता

रहूँ

17-08-2011

1372-94-08-11

Thursday, April 21, 2011

पत्थर समझ रास्ते से हटा देना

मेरे दिल का क्या
वो तो  निरंतर चाहता
रहता
कुछ ना कुछ कहता
रहता
उसकी बात पर गौर ना
फरमाना
वो तो आदत से मजबूर
निरंतर
हाल-ऐ-दिल बताता रहता
कसम
तुम्हें तुम्हारे खुदा की
कभी मुझे याद ना करना
ना चैन अपना खोना,
ना आँखों से अश्क बहाना
पत्थर समझ रास्ते से
हटा देना
खुशी से जिन्दगी बिताते
रहना 
21-04-2011
726-148-04-11

Wednesday, April 6, 2011

ये ना समझना कि मोहब्बत की आग बुझ गयी


मेरी खामोशी का
मतलब
ये ना समझना कि
मोहब्बत
की आग बुझ गयी
ये बात जुदा है कि
अब उसे
दबाना सीख लिया
अब दोस्ती ग़मों से
कर ली
साथ उनके जीना
सीख लिया
अश्क भी आते हैं ,
मुझे रुलाते हैं
वो भी निरंतर उनके
गम में
आने से पहले ही
सूख जाते हैं
06-04-2011
615-48 -04-11

Thursday, March 24, 2011

कहां तो सोचा था ,फितरत तुम्हारी बदल गयी



कहां  तो सोचा था
फितरत तुम्हारी बदल गयी
पता ना था
तुम भी खामोशी से
बर्दाश्त कर रहीं 
मन ही मन तुम भी रो रहीं
छुप छुप कर  दुआ कर रहीं
दिल की आग को
किसी तरह भड़कने से
रोक रहीं
दिल को काबू में कर रहीं
मैं  भी हालात से मजबूर हूँ,
जला कर राख ना कर दे
निरंतर उस मंजर से डरता हूँ
इस लिए ज़रिए कलम 
हाल-ऐ-दिल बयाँ करता हूँ
खिजा में बहारें ढूंढता हूँ
सुकून की ख्वाइश रखता हूँ
24-03-03
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
492—162-03-11

Friday, March 18, 2011

रिश्तों पर विराम लग गया,अहम् अब अहम् हो गया




 रिश्तों पर विराम
लग गया
अहम् अब अहम्
हो गया
कौन पहल करे
सवाल खडा हो गया
इक दूजे के जहन में
दिन रात सवार हो गया
दिलों में जहर भर गया 
निरंतर ध्यान दूजे का
रहता
किसे क्या कहाँ
मालूम करता रहता
मन किसी का चैन से
ना रहता
तिल का ताड़ बन गया
सहयोग दोनों का रहा
जो पहल करे
वो छोटा हो गया
इज्ज़त का सवाल
हो गया
अहम् जीत गया
भाई चारा हार गया
19-03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
448—117-03-11
    

दिल-ओ-जान से चाहने वाले,दिल-ऐ-दुश्मन समझे गए




ज़िन्दगी में
दर्द का जलजला आया
जिन्हें बचाने को जान देता
उन्होंने ही कातिल कहा
चेहरा शर्म से झुक गया
यकीन खुद से उठ गया
रोना भी गवारा ना हुआ
अश्क निकलने से पहले ही
सूख गए
वो भी इलज़ाम से घबरा गए
जवाब देते भी नहीं बनता
जहन में मौत का सन्नाटा
कानों में निरंतर उनके
लफ्ज गूंजते
दिल-ऐ-दुश्मन समझे गए
18-03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
447—116-03-11