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Friday, March 18, 2011

रिश्तों पर विराम लग गया,अहम् अब अहम् हो गया




 रिश्तों पर विराम
लग गया
अहम् अब अहम्
हो गया
कौन पहल करे
सवाल खडा हो गया
इक दूजे के जहन में
दिन रात सवार हो गया
दिलों में जहर भर गया 
निरंतर ध्यान दूजे का
रहता
किसे क्या कहाँ
मालूम करता रहता
मन किसी का चैन से
ना रहता
तिल का ताड़ बन गया
सहयोग दोनों का रहा
जो पहल करे
वो छोटा हो गया
इज्ज़त का सवाल
हो गया
अहम् जीत गया
भाई चारा हार गया
19-03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
448—117-03-11
    

दिल-ओ-जान से चाहने वाले,दिल-ऐ-दुश्मन समझे गए




ज़िन्दगी में
दर्द का जलजला आया
जिन्हें बचाने को जान देता
उन्होंने ही कातिल कहा
चेहरा शर्म से झुक गया
यकीन खुद से उठ गया
रोना भी गवारा ना हुआ
अश्क निकलने से पहले ही
सूख गए
वो भी इलज़ाम से घबरा गए
जवाब देते भी नहीं बनता
जहन में मौत का सन्नाटा
कानों में निरंतर उनके
लफ्ज गूंजते
दिल-ऐ-दुश्मन समझे गए
18-03-2011
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
447—116-03-11

  

निरंतर ख्याल उनका रखना है दिल कभी ना दुखाना है




भयानक 
सच से मुखातिब हुआ
दिमाग सुन्न हुआ
पता नहीं था
यकीन अपनों का खोया
यकीन खुद का
खुद पर से
भी टूट गया
कब अपने हाथों से
सितम अपनों पर हुआ
अहसास भी ना हुआ
अनजाने में गुनाह हुआ
अपने रोते रहे
हम अनजान रहे
क्या सज़ा खुद को दूं?
कैसे भुगतान उस का  करूँ ?
कैसे मुंह उन्हें दिखाऊँ?
जिस जगह खडा हूँ
रास्ता कोई दिखता नहीं
हिम्मत हारूँ 
या नया रास्ता बनाऊँ
अब तय कर लिया
फिर से चलना है
फिर से चलना है
यकीन उनका पाना है
निरंतर ख्याल उनका
रखना है
दिल कभी ना
दुखाना है
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
445—115-03-11

Thursday, March 17, 2011

साहब का चपडासी था , इस बात का रूतबा था



साहब का चपडासी था
इस बात का रूतबा था
साहब से डांट खाता,
गुस्सा,फ़रियाद ले कर
आने वालों पर उतारता
साहब व्यस्त हैं ,
ज़ल्द बाज़ी मत करो
बाद में आना कह कर
उन्हें अपना महत्त्व बताता
चाय पानी के पैसे
कभी छोटा मोटा
उपहार देने वालों पर
क्रपा रखता
उनकी पर्ची नीचे से
ऊपर करता
कब साहब का मूड ठीक है
कान में बताता
जो उसका ध्यान नहीं रखता,
उसकी पर्ची ऊपर ना
आने देता
साहब का मूड खराब हो
तो फौरन अन्दर भेजता 
साहब के सामने भीगी
बिल्ली बनता
बेटा बेटी बीमार हो
अस्पताल में दिखाना हो
फ़रियाद से पहले 
दस बार सोचता
जब साहब पुराने होते
हर आदत पहचानता
पसंद,नापसंद
अच्छी तरह पहचानता
कमजोरियां भी 
खूब जानता  
मिलने आने वाले 
क्या काम करते
सब मालूम करता 
खुद के काम भी
आसानी से निकालता
रहने का स्तर 
तनखा से ज्यादा था
बीस बरस बाद भी 
साहब का
चपड़ासी रहना चाहता
उसे पता था साहब 
तरक्की पाते पाते
सबसे बड़े साहब बनेंगे
उस के बच्चों की 
नौकरी का प्रबंध
भी करेंगे
इस लिए पूरी 
तन्मयता से
उनकी सेवा करता
साहब चाहे जल्लाद हो
उन्हें देवता कहता
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
444—114-03-11


गरीब,गरीब रहता,निरंतर रोता था,अब भी रोता रहता




अब क्या नहीं होता?
नेता अभिनय करता
निरंतर झूंठ बोलता
अफसर नित नए
घोटालों में फंसता
बेटा बाप का बाप होता
बाबा धर्म बेचता
परदे की आड़ में
ना जाने क्या क्या करता
ईमान का दाम लगता
व्यभिचार खुले आम होता
छात्र शिक्षक को सिखाता
शिक्षक,
छात्र सा व्यवहार करता
मोबाइल से सब कुछ होता
प्रेमी निरंतर बदलता
वेलेंटाइन डे सबसे बड़ा
त्योंहार होता
शर्म को किताबों में
पढ़ा जाता
आडम्बर आवश्यक होता
पैसा माँ बाप होता
धन का नंगा नाच होता
विश्वाश घात वक़्त का
तकाजा कहलाता 
मगर गरीब का
कुछ नहीं बदलता
गरीब,गरीब रहता
निरंतर रोता था
अब भी रोता रहता
डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
443—113-03-11

भद्दा चेहरा अच्छे मेकअप से,विकृत शरीर सुन्दर कपड़ों से ढका है



पहले पहाड़ों में
छोटे से गाँव में रहता था
छोटी छोटी कंकरीली 
पगडंडियों से
आना जाना आफत 
लगता था
कहीं भी जाना हो 
समय बहुत लगता
निरंतर सोचता 
शहर जैसी सडकें होती तो
कितना अच्छा होता
फौरन यहाँ से वहाँ पहुंचता
अब बरसों की इच्छा पूरी हुयी
शहर में नौकरी लग गयी
आज वो डामर की सड़क पर
मक्खन पर चाकू चले 
ऐसे चल रहा
 ऐसा लग रहा जैसे 
उड़ कर जा रहा
बहुत खुश था
मगर ज्यादा वक़्त 
ना रह सका
जब व्यस्त सड़क पर पहुंचा
आती जाती गाड़ियों के 
धुएं से पाला पडा
नाक में धुएं को सूंघते सूंघते ,
दर्द से सर फटने लगा
सड़क के दोनों तरफ 
पेड़ों का नामों निशाँ ना था
दोनों तरफ की झाड़ियाँ धुएं से
काली पड गयी थी
पोलीथीन की थैलियों,
गुटके के पाउचों से भरी थी
तभी चलती कार से 
किसी ने पीक मारी
छींटों ने चेहरा और 
कमीज़ खराब कर दी
चेहरा रुमाल से साफ़ किया
होर्न की आवाजों और धुएं ने
सर दर्द बढ़ा दिया
फौरन घर लौटने का 
फैसला किया
लौटते हुए सोचने लगा ,
गाँव का रास्ता 
पथरीला और छोटा सही
मगर गंदा ना था , 
ना धुंआ ना शोर था
पेड़ों की छाया से ढका था ,
झाड़ियों में फूलों का 
मेला होता था
शोर की जगह
कोयल की कूंक और 
बुलबुल की र्चीच्यू ,
मोर की पियाऊँ सुनायी देती
ठंडी बयार मन को 
शांत रखती
समझ नहीं आता
क्यूं इंसान निरंतर गाँव से
शहर की ओर भागता
ज्यादा पैसे और 
भौतिक सुखों के सिवा
सब कुछ खोता
ऐसा लगता जैसे
भद्दा चेहरा अच्छे 
मेकअप से
विकृत शरीर सुन्दर 
कपड़ों से ढका है

डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",अजमेर
442—112-03-11