हर लफ्ज
तेरी यादों में ढला
जहन तेरे
ख्यालों से भरा
हर नज़्म में होता
ज़िक्र तेरा
दिल निरंतर गम में
रोता
डगर मोहब्बत की
चुनी मैंने
सिला जो भी हो
मंज़ूर मुझे
17-07-2011
1199-79-07-11
निरंतर कुछ सोचता रहे,कुछ करता रहे,कलम के जरिए बात अपने कहता रहे.... (सर्वाधिकार सुरक्षित) ,किसी की भावनाओं को ठेस पहुचाने का कोई प्रयोजन नहीं है,फिर भी किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचे तो क्षमा प्रार्थी हूँ )