उन्होंने हमें गालियों से नवाज़ा
हम तारीफ़ समझ कर चुप रहे
उन्होंने हम पर पत्थर मारे
हमने फूल समझ कर झेल लिए
उन्होंने बेवफा कहा
हमने उन्हें आइना दिखा दिया
वो मुंह छुपा कर चल दिए
944-63-15-12-2012
शायरी,बेवफा,उम्मीद
निरंतर कुछ सोचता रहे,कुछ करता रहे,कलम के जरिए बात अपने कहता रहे.... (सर्वाधिकार सुरक्षित) ,किसी की भावनाओं को ठेस पहुचाने का कोई प्रयोजन नहीं है,फिर भी किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचे तो क्षमा प्रार्थी हूँ )
खुद को भूल गए
सुबह-ओ-शाम सिर्फ
उनको ढूंढते रहे
दाने दाने को
मोहताज़ हो गए
वो बड़े बेवफा निकले
बेरुखी से रुस्वां हो गए
खाने को गम
पीने को आंसू रह गए
निरंतर रोते रोते
एक बात समझ गए
दिल लगाना बुरा नहीं
दिल जलाना क़यामत है
मोहब्बत के खेल में
कुछ भी मुमकिन है
01-08-2011
1284-06-08-11