निरंतर कुछ सोचता रहे,कुछ करता रहे,कलम के जरिए बात अपने कहता रहे.... (सर्वाधिकार सुरक्षित) ,किसी की भावनाओं को ठेस पहुचाने का कोई प्रयोजन नहीं है,फिर भी किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचे तो क्षमा प्रार्थी हूँ )
Friday, March 1, 2013
आज कुछ लिखूं या ना लिखूं
Friday, September 7, 2012
उन्हें तो बरसना है,केवल बरसना है
Tuesday, May 15, 2012
बिना भावनाओं के जीवन
आज कलम कुछ रुकी रुकी सी है
523-43-05-12
Monday, November 14, 2011
क्षणिकाएं -2
Monday, August 8, 2011
मेरी गुडिया
मेरे बचपन की साथी
एकांत का सहारा
सबसे अच्छी सहेली
मेरी गुडिया अब भी
मेरे साथ है
अलमारी में
करीने से रखी
लाल स्कर्ट,
गुलाबी ब्लाऊज
सुनहरी बाल वाली
गुडिया बचपन में
निरंतर मेरे साथ रहती
मेरी भावनाओं का
प्रतीक थी
जैसा माँ मेरे साथ करती
वैसा ही मैं
गुडिया के साथ करती
कभी प्यार करती,
कभी डांट लगाती
मेरी व्यथा,
हंसी,खुशी की बातें
उसे सुनाती
उसके बाल बनाती ,
कपडे धोती,
साथ सुलाती
हर दिनचर्या की
नक़ल का प्रयत्न करती
गुडिया मेरे लिए
खिलोना नहीं
जीवन का अटूट
हिस्सा थी
भावनाएं
व्यक्त करने का
साधन थी
जीवन में ऐसा दूसरा
कोई ना मिला
जो मेरी
हर बात सहता
हर बात सुनता
फिर भी चुप रहता
अब भी जब व्यथित
होती हूँ
किसी अपने को
तलाशती हूँ
मन की बात कहना
चाहती हूँ
गुडिया को अलमारी से
निकाल कर
सारी भड़ास उस पर
निकालती हूँ
वो चुपचाप सब
सुनती है
मन सहज,
क्रोध और व्यथा
कम हो जाती है
मेरी हिम्मत
फिर लौटती है
स्वयं को
व्यस्थित और शांत
पाती हूँ
08-08-2011
1318-40-08-11