Showing posts with label भावनाएं. Show all posts
Showing posts with label भावनाएं. Show all posts

Friday, March 1, 2013

आज कुछ लिखूं या ना लिखूं



सोच रहा हूँ
आज कुछ लिखूं
या ना लिखूं
कागज़ को रीता छोड़ दूं
कलम को विश्राम दे दूं
मन में प्रश्न कोंधने लगता है
क्या कागज़ को मेरा
व्यवहार अच्छा लगेगा
कलम को भाएगा
उन्हें तो मेरे मन से निकले
शब्दों को अँधेरे से निकाल कर
उजाला दिखाने की आदत
पड़ चुकी है
आज कुछ नहीं लिखूंगा तो
कागज़ कलम का मन
कैसे लगेगा
इतना स्वार्थी नहीं हूँ
जिन्होंने सदा साथ निभाया
उनकी भावनाओं का
ध्यान ही नहीं रखूँ
यही सोच कर आज फिर
लिखने बैठ गया हूँ
01-03-01-01-2013
भावनाएं ,स्वार्थी,स्वार्थ,

Friday, September 7, 2012

उन्हें तो बरसना है,केवल बरसना है



बादलों को
किसी और बात से
क्या लेना देना
उन्हें तो बरसना है
केवल बरसना है
यह भी नहीं पता
कहाँ बरसना है
कितना बरसना है
चाहे किसी का घर ढह जाए
कोई पानी में बह जाए
पेड़ पौधे गल जाएँ
मानवीय भावनाओं से दूर
घमंड में सफलता की
ऊंचाइयां छू रहे
लोगों का भी यही हाल है
वो भी केवल
अपने लिए ही जीते हैं
उनकी भूख मिटनी चाहिए
किसी और से उन्हें
क्या मतलब
07-09-2012
727-23-09-12


Tuesday, May 15, 2012

बिना भावनाओं के जीवन

कोई पंछी ना उड़ता
सितारा ना जगमगाता
चाँद बादलों के पीछे
छुपा रहता
सूरज कभी ना उगता
तो आकाश को कौन
पूछता
विशाल और विस्तृत
होते हुए भी गौण होता
उस मैदान सा जिसमें
ना घास ना वृक्ष
उस सूने राजमहल सा
जिसमें कोई नहीं रहता
सन्नाटा जहां काटने को
दौड़ता
विशाल के साथ सूक्ष्म
भी आवश्यक होता
बिना भावनाओं के
जीवन होते हुए भी
व्यर्थ होता 
सूने आकाश से कम
नहीं लगता
15-05-2012
527-47-05-12


आज कलम कुछ रुकी रुकी सी है

कुछ रुकी रुकी सी है
भावनाएं भी ठहरी हुयी हैं
रुकावटें मुंह बायें खडी हैं
चिंताएं बढ़ी हुयी हैं
कुछ लिखूं
या चिंताएं दूर करूँ
झंझावत में फंसी हुयी है
इधर कुआ उधर खाई है
लिखूं नहीं तो मन
तडपेगा
लिखूं तो समय
लिखने में लगेगा
जब तक चिंताओं को
झेलना होगा
अब फैसला कर लिया
लिख कर तनाव दूर
करूंगा
चिंताओं का बोझ
हल्का करूंगा
फिर ठन्डे दिमाग से
सोचूंगा
चिंता मुक्त होने का
मार्ग निकालूँगा
14-05-2012
523-43-05-12

Monday, November 14, 2011

क्षणिकाएं -2


हँसी
हँस तो लिए
हँसाया क्यों नहीं ?
ये भी सोचा कभी
****
"मैं"
मेरी "मैंने
मुझ को मारा
ख्याल करो
तुम्हारी "मैं"
तुम्हें मारेगी
****
सत्य -विचार
सत्य होता है
इसलिए विचार आते हैं
सत्य नहीं होता तो
विचार भी नहीं आते
****
रोना
आंसूओं का
आँखों से
क्या लेना देना
अंधे भी रोते हैं
****
भावनाएं
भावनाएं आंसू
बन कर बहती हैं
मनोस्थिती
दर्शाती हैं
****
सत्य -झूठ
सत्य  के  बिना
झूठ अर्थहीन
झूठ के बिना
सत्य अर्थहीन
एक दूसरे के बिना
दोनों अस्तित्वहीन
13-11-2011
1787-58-11-11

Monday, August 8, 2011

मेरी गुडिया

मेरे बचपन की साथी

एकांत का सहारा

सबसे अच्छी सहेली

मेरी गुडिया अब भी

मेरे साथ है

अलमारी में

करीने से रखी

लाल स्कर्ट,

गुलाबी ब्लाऊज

सुनहरी बाल वाली

गुडिया बचपन में

निरंतर मेरे साथ रहती

मेरी भावनाओं का

प्रतीक थी

जैसा माँ मेरे साथ करती

वैसा ही मैं

गुडिया के साथ करती

कभी प्यार करती,

कभी डांट लगाती

मेरी व्यथा,

हंसी,खुशी की बातें

उसे सुनाती

उसके बाल बनाती ,

कपडे धोती,

साथ सुलाती

हर दिनचर्या की

नक़ल का प्रयत्न करती

गुडिया मेरे लिए

खिलोना नहीं

जीवन का अटूट

हिस्सा थी

भावनाएं

व्यक्त करने का

साधन थी

जीवन में ऐसा दूसरा

कोई ना मिला

जो मेरी

हर बात सहता

हर बात सुनता

फिर भी चुप रहता

अब भी जब व्यथित

होती हूँ

किसी अपने को

तलाशती हूँ

मन की बात कहना

चाहती हूँ

गुडिया को अलमारी से

निकाल कर

सारी भड़ास उस पर

निकालती हूँ

वो चुपचाप सब

सुनती है

मन सहज,

क्रोध और व्यथा

कम हो जाती है

मेरी हिम्मत

फिर लौटती है

स्वयं को

व्यस्थित और शांत

पाती हूँ
08-08-2011

1318-40-08-11