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Friday, November 23, 2012

परेशान मन



परेशान मन से
सोने का प्रयत्न करता रहा
करवटें बदलता रहा
मगर नींद नहीं आयी
मन टटोला तो आभास हुआ
आज कुछ लिखा नहीं
इसलिए मन परेशान है
तुरंत उठ कर
कलम हाथ में ले ली
कविता लिखने का
प्रयास करता रहा
मगर शब्दों ने साथ
नहीं दिया
फिर भी कुछ लिखना
तो था ही
तुरंत लिख दिया
जब मन परेशान होता है
तो ना नींद आती है
ना चैन मिलता है
मन को
खुश रखने के लिए
मन का
कहा करना होता है
लिखते ही
मन प्रसन्न हो गया
मैं भी नींद की गोद में
समा  गया
859-43-23-11-2012
मन,नींद,परेशान,चैन

Friday, November 16, 2012

सोना चाह रहा हूँ पर सो नहीं पा रहा हूँ



सोना चाह रहा हूँ
पर सो नहीं पा रहा हूँ
सोऊँ भी कैसे
मन परेशान हो तो
नींद भी कहाँ आती है
नींद भी मज़े ले रही है
कहती है
मन को खुश करो तो आऊँ
दुखी मन में आ कर भी
क्या करूँ
तुम तो दुखी हो
मुझे भी दुखी करोगे
मैं दरवाज़े पर खडी
इंतज़ार कर रही हूँ
जब थक जाओगे
तो बिना बुलाये ही
आ जाऊंगी
846-30-16-11-2012
नींद,निद्रा,खुशी,चैन,बेचैनी

Thursday, October 25, 2012

सुबह आँख खुली तो



सुबह आँख खुली तो
मेरे कमरे की
खिड़की में बैठा मिट्ठू बोला
बोल बोल कर तुम्हें
उठाने का प्रयत्न किया
पर तुम नींद से जागे नहीं
थक हार कर मैं बैठ गया
अपने आप से कहने लगा
उठोगे तो
प्रश्न अवश्य करूंगा
कैसे इतनी गहरी नींद में
सोते हो तुम
मिट्ठू की बात का
मुझे अचम्भा नहीं हुआ
निरंतर इस प्रश्न का
उत्तर देता रहा
आज उसे भी बता दूं
सत्य गहरी नींद का
मैंने कहा लोग दिन रात
सपने देखते हैं
जो कल हो चुका
जो कल होने वाला है
उसकी चिंता में
दिन रात जागते हैं
ना ठीक से सो पाते
ना ठीक से जाग पाते
परेशानी में
ज़िन्दगी काटते रहते
मैं निश्चिंत सोता हूँ
जो हो चुका उससे केवल
शिक्षा लेता हूँ
जो होने वाला है
उसकी चिंता करे बिना
कर्म में लगा रहता हूँ
इसलिए गहरी नींद में
सो पाता हूँ
बात सुन कर मिट्ठू बोला
मैं भी अब आकाश को
नापने निकलता हूँ
कल फिर आऊँगा
पर तुम्हारे उठने के बाद
तब तक मैं भी
गहरी नींद में सोऊँगा
799-41-25-10-2012
नींद,निश्चिंत

Friday, April 20, 2012

नींद मानो रूठ कर बैठ गयी


रात
नींद को बुलाता रहा
करवटें बदलता रहा
पर  नींद मानो 
रूठ कर बैठ गयी ,
बहुत
कशमकश और मिन्नतों के
बाद भी नहीं आयी
जब आयी तो
मुझे पता ही नहीं चला
कब आयी,
शायद थक हार कर
आँखें अपने आप
बंद हो गयी
नींद की गोद में जाते ही
मैंने उससे
नाराजगी का कारण पूछा
तो कहने लगी
तुम मुझे ढंग से बुलाते कहाँ हो
बिस्तर पर लेटते ही
कभी टीवी देखते हो
कभी विचारों में मग्न
हो जाते हो
दिन में क्या हुआ ?
किसने क्या करा,कहा ,
कल क्या करना है
पुरानी बातें याद कर के
व्यथित होते रहते हो
बेहद थके होते हो
जब अवश्य ऐसा नहीं होता
अब तुम्ही बताओ
मैं आ कर भी क्या करूँ
मन की उद्वेलित अवस्था में
आ भी जाऊं तो ,
तुम रात भर सपने में भी
वही सब करोगे
मुझे बुलाना हो तो
विचारों का मंथन त्याग कर
शांत मन और मष्तिष्क से
बुलाओ
परमात्मा का ध्यान करो
मैं तुरंत आकर तुम्हें
अपने गोद में ले लूंगी
हाँ ,अस्वस्थता में
अवश्य स्वयं पर वश
नहीं रहता
20-04-2012
469-50-04-12

Thursday, April 12, 2012

अँधेरे में भी रोशनी निरंतर मेरे साथ रहती


आज भी दिन भर
दिमाग में
कोई ना कोई उधेड़बुन
चलती रही
खुद से सवाल किया
क्या ज़िन्दगी
ऐसे ही चलती रहेगी ?
मन की आस फिर भी
टूटी नहीं
बिस्तर पर लेटते ही
आँखें बंद हो गयी 
जिनकी हर इच्छा पूरी
हो जाती
नींद की तलाश में
ज़िन्दगी भर भटकते रहते
अधिक पाने की इच्छा में
सो ना पाते
यही क्या कम बात है ?
मुझे इतनी आसानी से
नींद आ जाती
अँधेरे में भी रोशनी 
निरंतर मेरे साथ रहती

11-04-2012
434-14-04-12

Tuesday, December 13, 2011

ज़िन्दगी करवटों में गुजरती रही


सर्दी गर्मी बरसात
फुटपाथ पर रहता था
बचपन से बुढापा
फुटपाथ पर ही कटा था
रात को
सोने की कोशिश करता
कोई ना कोई सोने
नहीं देता
कभी गाडी का तेज़ हौर्न
कभी शराबियों की
गाली की आवाज़
कभी कुत्तों के
भोंकने की आवाज़
नींद को दूर भगाती
कभी पड़ोस के मकानों में से
किसी एक की खिड़की खुलती
आवाज़ आती ,
सर्दी में कहीं मर ना जाए
बरसात में भीग कर बीमार
ना हो जाए
खिड़की जितनी देर से
खुलती
उतनी ज़ल्दी बंद हो जाती
उसे सोने नहीं देती
कभी एक पोटली की
जायदाद कोई ले ना जाए
इस चिंता में उड़ जाती
कोई एक रात
बिना शोर के आती
तो शोर की आदत भी
सोने नहीं देती
निरंतर नींद से
आँख मिचोली चलती
रहती
रात गुज़रती भी नहीं
सुबह हो जाती
बरसों हो गए
नींद के इंतज़ार में उम्र
गुजर गयी
नींद रूठी की रूठी ही रही
ज़िन्दगी करवटों में
गुजरती रही
शायद नींद को भी
फुटपाथ पर
सोने की मजबूरी कभी
समझ नहीं आयी
लगता है
उसे भी नर्म बिस्तर की
आदत पड़ गयी
13-12-2011
1858-26-12

Saturday, November 26, 2011

क्षणिकाएं -4


ओस
ओस
की बूँद जब तक
पिघलती नहीं
चमकती रहती
जीने का अर्थ
समझाती रहती
हम अब
 "मैं"में 
सिमट गए हैं 
दिल-ओ-दीमाग के
दरवाज़े 
बंद हो गए हैं 
रिश्वत
रिश्वत देना पाप है
लेना मजबूरी
वक़्त के साथ
चलना ज़रूरी है
नींद
नींद नहीं होती
तो कोई सोता नहीं
रातों को जागता नहीं


व्यस्तता
महीनों हो गए
पड़ोसी से मिले हुए
शहर के
लोगों से मिलने में
व्यस्त थे
जीवन- म्रत्यु
म्रत्यु क्या है ?
जीवन का अंत
जीवन क्या है ?
म्रत्यु का इंतज़ार
18-11-2011
1797-68-11-11

Wednesday, October 12, 2011

अब नींद कहाँ आती



उनकी याद में
अब नींद कहाँ आती
पलकें थक कर
खुद-ब-खुद बंद
हो जाती हैं
मन की चीखें सोने
नहीं  देती हैं
कानों में
उनकी आवाज़
निरंतर गूंजती
दिल को बेहाल करती
अब ठंडी हवा भी
दिल की आग ठंडी
नहीं करती
उम्र अब बेबसी में
कटती
12-10-2011
1638-46-10-11

Friday, August 12, 2011

निरंतर इंतज़ार के बाद उनका पैगाम आया

निरंतर
इंतज़ार के बाद
उनका पैगाम आया
सुबह मिलने का
वक़्त तय हुआ
रात भर उम्मीद में
जागता रहा
सुबह मिलने का
वक़्त आया
नींद के आगोश में
खो चुका था
नींद खुली बहुत
देर हो चुकी थी
उन्होंने
किसी और का हाथ
थाम लिया था

11-08-2011

1338-60-08-11