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Saturday, November 26, 2011

क्षणिकाएं -4


ओस
ओस
की बूँद जब तक
पिघलती नहीं
चमकती रहती
जीने का अर्थ
समझाती रहती
हम अब
 "मैं"में 
सिमट गए हैं 
दिल-ओ-दीमाग के
दरवाज़े 
बंद हो गए हैं 
रिश्वत
रिश्वत देना पाप है
लेना मजबूरी
वक़्त के साथ
चलना ज़रूरी है
नींद
नींद नहीं होती
तो कोई सोता नहीं
रातों को जागता नहीं


व्यस्तता
महीनों हो गए
पड़ोसी से मिले हुए
शहर के
लोगों से मिलने में
व्यस्त थे
जीवन- म्रत्यु
म्रत्यु क्या है ?
जीवन का अंत
जीवन क्या है ?
म्रत्यु का इंतज़ार
18-11-2011
1797-68-11-11

Thursday, November 10, 2011

दिल कभी ना मिलेंगे


मैं,आप नहीं हूँ
आप,मैं नहीं हैं
मैं
मैं रहना चाहता हूँ
आप
आप रहना चाहते हैं
यही तो समस्या है
जब तक
"मैं" आप नहीं
बनूंगा
आप "मैं" नहीं
बनेंगे
दिल कभी ना मिलेंगे
समस्या
समस्या ही रहेगी
10-11-2011
1773-41-11-11

Sunday, July 17, 2011

इक आवाज़ ने मुझे जगाया ,सुकून का फलसफा समझाया

दिल दर्द से रो
रहा था
ग़मों का सैलाब
आया था
इक आवाज़ ने मुझे
जगाया
सुकून का फलसफा
समझाया
परेशान ना हो
"मैं"को छोडो
"मैं"दर्द बढाता
क्या किसी ने कहा ?
क्या किसी ने करा?
जहन से निकालो
करने वाले करते रहेंगे
निरंतर 
आगे बढना तो
खुद पर काबू रखो
आसान नहीं सब
करना
ये भी जान लो
लाख चलन लोग
अपना भूलें
तुम अपना चलन
ना भूलो
खून का घूँट पी लो
सफलता और सुकून
लिखवा कर ले लो
17-07-2011
1195-75-07-11