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Saturday, December 8, 2012

मुझे हक नहीं



मुझे हक नहीं
तुम पर नाराज़ होने का
ना हक तुम्हारी बेरुखी पर
सवाल पूछने का
उम्मीदों पर जब नहीं
उतर सका खरा
नहीं दे सका जो चाहा
तुमने मुझसे
निभा ना सका उन वादों को
जो किये तुमसे
मुझे हक नहीं तन्हाई में भी
आसूं बहाने का
जब तुम्हारी हसरतों के
लायक ही ना था
मुझे हक नहीं तुम पर
इलज़ाम लगाने का
गुनाहगार भी मैं हूँ
सज़ा का हक़दार भी मैं  हूँ
जिसने दिल लगाया था
इक पत्थर दिल से
923-41-08-12-2012
दिल,हक, हसरत,हसरतें,मोहब्बत, शायरी,

Tuesday, July 24, 2012

मजबूर हूँ



खामोश रहे हैं
खामोश रहेंगे
जानते हैं
बिना जुबां खोले
हसरतें परवान नहीं
चढ़ सकतीं
हर बात इशारों से
नहीं कही जा सकती 
मजबूर हूँ
इमानदारी की फितरत
जुबान से
कुछ कहने नहीं देती
24-07-2012
617-14-07-12

Sunday, June 3, 2012

कैसे कहूँ ?

कैसे कहूँ ?
तुम्हारे ख्याल भर से
दिल में कुछ होता है
हसरतें अंगडाई लेने
लगती
उम्मीदें मुंह उठाने
लगती
लफ्ज होठों की
दहलीज पर आ कर
रुक जाते हैं
ना सुनने के खौफ से
डर जाते हैं
मन की बात मन में ही
रह जाती है
हर लम्हा तडपाती है
कैसे कहूँ
तुम्हारे ख्याल भर से
क्या कुछ सहता हूँ
03-06-2012
560-80-05-12

Tuesday, March 6, 2012

एक बार हमारी तरफ देख लो

एक बार
हमारी तरफ देख लो
तो कुछ
उम्मीद बंध जाए
देख कर मुस्कारा दो
तो ग़मों का बोझ कम
हो जाए
कुछ लफ्ज़ मोहब्बत के
कह दो
तो दिल को राहत
मिल जाए
डूबी हुयी हसरतें फिर से
जग जाएँ
हमें जीने का मकसद
मिल जाए
06-03-2012
303-37-03-12

Monday, February 13, 2012

मुस्कारा कर बोली ,अब कोई ज़ल्दी नहीं

शाम के वक़्त
बरसात से
बचने के खातिर
गीले कपड़ों में
पेड़ के नीचे  खडी
हुयी थी
पानी की बूँदें बालों से
उतरते हुए
चेहरे को भिगो रहीं थी
हल्की सर्दी उसे कंपा
रही थी 
घर जाने की ज़ल्दी
सता रही थी
चेहरे पर परेशानी
साफ़ झलक रही थी
मुझसे उसे यूँ परेशाँ
देखा ना गया
पास जाकर पूंछा
कहो तो घर छोड़ दूं
हौले से
मुस्कारा कर बोली
अब कोई ज़ल्दी नहीं
यूँ लगा जैसे
उसकी हसरतें परवान
चढ़ गयीं
13-02-2012
163-74-02-12

Saturday, November 19, 2011

ख्वाईशें दम तोडती रही


जब भी मिलते
निरंतर कहते हम से
किसी दिन
फुरसत में बात करेंगे
उनकी
फ़ुरसत के इंतज़ार में
उम्र बीत गयी
ना उन्हें फुरसत मिली
ना हमारी हसरतें
पूरी हुयी
ख्वाईशें
दम तोडती रही
दिल की बात
दिल में रह गयी
19-11-2011
1799-70-11-11

Thursday, October 20, 2011

सारे मौसम देख लिए



सारे मौसम देख लिए
 किस मौसम का अब  
इंतज़ार करूँ
बहारों को
खिजा में बदलते देखा
महकते फूलों को
मुरझाते देखा
अरमानों को निरंतर
टूटते देखा
हसरतें दम तोड़ चुकी
देखने की तमन्ना
बची नहीं
अब और सहने की
ताकत भी नहीं
सारे मौसम देख लिए
 किस मौसम का अब 
इंतज़ार करूँ   
20-10-2011
1680-87-10-11

Friday, October 7, 2011

दिल की प्यास निरंतर अधूरी की अधूरी रही


बादल गरजे
बिजली चमकी
बरसात नहीं आयी
वो नज़र आयी
मुस्करायी
मन में हसरतें
जगायी
फिर ना जाने
कहाँ छुप गयी
मन का चैन
खो गया
रातों की
नींद उड़ गयी
दिल की प्यास
निरंतर अधूरी की
अधूरी रही
07-10-2011
1622-30-10-11