निरंतर कुछ सोचता रहे,कुछ करता रहे,कलम के जरिए बात अपने कहता रहे.... (सर्वाधिकार सुरक्षित) ,किसी की भावनाओं को ठेस पहुचाने का कोई प्रयोजन नहीं है,फिर भी किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचे तो क्षमा प्रार्थी हूँ )
Monday, March 4, 2013
हर इच्छा किसकी पूरी होती है
Saturday, November 3, 2012
वो चाँद तो नहीं बन सकते
Sunday, October 28, 2012
दूर रहते हुए भी
कल रात भी चाँद
खिड़की से झाँक रहा था
पूरे कमरे को चांदनी से
नहला रहा था
शीतल चांदनी और खिड़की से
झांकते चाँद को देख
मन मुझसे कहने लगा
चाँद से पूछों
क्यों केवल चांदनी को
भेज कर काम चलाता
ये कौन सा रिश्ता निभाता
मेरे पूछने से पहले ही
चाँद समझ गया मन
क्या चाहता है
चाँद बोला मैं मित्रता का
रिश्ता निभाता हूँ
निरंतर दूर रह कर भी
प्रेम दर्शाता हूँ
चांदनी को नित्य धरती पर
भेजता हूँ
रात के अँधेरे को दूर कर के
तुम्हारा जीना आसान
करता हूँ
रिश्तों को निभाने के लिए
नित्य मिलना ही
आवश्यक नहीं होता
दूर रहते हुए भी रिश्तों को
निभाया जा सकता
संवाद बनाया जा सकता
अनेकानेक तरीकों से मित्र
मित्र की मदद कर सकता
चांदनी की
सुन्दर भेंट के साथ
चाँद सुन्दर सीख भी
दे गया
मन को भाव विव्हल
कर गया
Wednesday, October 10, 2012
काश धरती का आँगन भी आकाश सा होता
Monday, March 12, 2012
चाँद को देख कर क्या करूंगा,जब तुम सामने खडी हो
Saturday, November 5, 2011
चाँद ने उन्हें देखा तो शरमा गया
Thursday, July 28, 2011
इसे देखूं या उसे देखूं ?
जहाँ में खिले
इक ज़मीं पर
इक आसमाँ में
दोनों अक्स इक दूजे के
दिल सोच में फँसा
किसे देखूं ?,
किसे ना देखूं ?
दोनों टुकड़े दिल के मेरे
ना दिल तोड़ सकता
ना नाराज़ कर सकता
ख्यालों के
चौराहे पर खडा हूँ
निरंतर खुद से पूंछता हूँ
इसे देखूं या उसे देखूं ?
उनकी पूँछ लूं ?
28-07-2011
1258-142 -07-11
जहाँ में खिले
इक ज़मीं पर
इक आसमाँ में
दोनों अक्स इक दूजे के
दिल सोच में फँसा
किसे देखूं ,किसे ना देखूं
दोनों टुकड़े दिल के मेरे
ना दिल तोड़ सकता
ना नाराज़ कर सकता
ख्यालों के
चौराहे पर खडा हूँ
निरंतर खुद से पूंछता हूँ
इसे देखूं या उसे देखूं ?
उनकी पूँछ लूं ?
28-07-2011
1258-142 -07-11