Wednesday, March 30, 2011

उन्हें याद हो ना हो,वो हमें याद आयेंगे

उन्हें 
याद हो ना हो
हमें याद आयेंगे
दरवाज़ा दिल का
निरंतर खुला रखेंगे
मंदिर मस्जिद में
दुआ करेंगे
मगर हसरतें ना
मिटाएँगे
सूरत उनकी बसी
मन में
अब ना भूल पायेंगे
कयामत तक इंतज़ार
करेंगे
ज़मीन पर ना मिलें
तो कोई बात नहीं
ज़न्नत में उनसे
मिलेंगे
दिल के अरमान पूरे
करेंगे  
 30-03-03
558—228-03-11

वो प्रक्रति के करीब हैं,फूल उन्हें पसंद है


वो प्रक्रति के करीब हैं,
फूल उन्हें पसंद है
कचनार,अमलतास,
पलाश,गुलमोहर,
के रंग उन्हें भाते
चमेली,मोगरा,
गुलाब,चम्पा,
महक से लुभाते,
कमल,ऑर्किड,
डेहलिया,गुलदाऊदी
के रूप उन्हें  मोहते,
निरंतर फूल
वो बालों में लगाते
निरंतर महकते,
रंग,रूप से मोहते
अपने
अंदाज़ से लुभाते
खुद किसी फूल से
कम ना लगते
इस लिए दिल से
भाते
30-03-03
557—227-03-11

इंसान कमज़ोर या तगड़ा,बिना गुण किसी को ना भाता


फूल
एक पंखुड़ी का हो
या सैकड़ों पंखुड़ियों का
फूल कहलाता 
निरंतर लुभाता
सदा महकता
इंसान
कमज़ोर या तगड़ा
बिना गुण
किसी को ना भाता
गुण एक या अनेक
इंसान के लिए ज़रूरी
सुधार की कोशिश ज़रूरी
जज्बा अगर ठीक हो
गुण बढ़ते जाएँगे
कमजोर मज़बूत होते
जाएँगे
क्यों ना ठान लें ?
अवगुणों को दूर करना
गुणों को हांसिल करना
सब को यही सिखाना
नए सफ़र पर चलना
नवजीवन प्रारम्भ करना
ध्येय अब बनाना है
30-03-03
556—226-03-11
   

दिल करे तो जवाब दे दें ,नहीं तो सपने में आ कर बता दें


क्यूं ख़त का 
जवाब उन्होंने अब तक
दिया नहीं
या तो ख़त मिला नहीं
या मतलब समझा नहीं
या तो नाराज़ हो गए
शक से देखने लगे
या फिर वक़्त मिला नहीं
 निरंतर क्यां लिखूं ?
क्या ना लिखूं ?
के चक्कर में फँस गए
या कैसे लिखूं
के सोच में पड़ गए
कौन उन्हें समझाए

दिल करे तो जवाब
दे दें
नहीं तो सपने में
आ कर बता दें
30-03-03
554—224-03-11

प्यार से जीना चाहता



फाख्ता 
सा उड़ना चाहता
आकाश में खोना
चाहता
हरे भरे पेड़ पर
घोंसला बनाना चाहता
मीठे फल खाना चाहता
मिठास उनकी बांटना
चाहता
फूलों के बीच रहना
चाहता
उन सा महकना
चाहता
जोड़े से रहना चाहता
निरंतर प्यार से
जीना चाहता
30-03-03
553—223-03-11

वो इंतज़ार कराते,मैं इंतज़ार करता


 
वो इंतज़ार कराते
मैं इंतज़ार करता
वो तरसाते मैं तरसता
वो सताते मैं सहता
अंदाज़
उन का समझता
वो दिल कहीं और
लगाते
मैं ख्वाब देखता  रहता
उन के शौक को
निरंतर
हकीकत समझता
30-03-03
552—222-03-11

दिल से पूंछता हूँ



निरंतर,
दिल से पूंछता हूँ
कैसे दर्द उसका कम
करूँ
प्यास उसकी बुझाऊँ
शमा मोहब्बत की
फिर से जलाऊँ
अरमानों की किश्ती
किनारे लगाऊँ
थक गया
बेरहम दुनिया से
हंस कर
ज़ख्म खाते खाते
मलहम
कौन सा लगाऊँ
कहाँ से
कोई मेहरबाँ लाऊँ
जो खिजा को बहार में
बदल दे
तुझे सुकून दे दे
30-03-03
551—221-03-11