Wednesday, September 19, 2012

ग़मों की बारिश अगर रुकी नहीं



ग़मों की बारिश अगर
रुकी नहीं
तो यादें  ज़हन में
इस हद तक ठहर
जायेंगी
जो हो रहा आँखों के
सामने
कभी याद बन कर नहीं
आयेगा
यादें ही मौत का सबब
बन जायेंगी
19-09-2012
734-30-09-12

Saturday, September 15, 2012

लोग आते हैं,लोग जाते हैं



ज़िन्दगी में
लोग आते हैं
लोग जाते हैं
कुछ याद आते हैं
कुछ याद भी नहीं रहते
कुछ याद करते हैं
कुछ भूल जाते हैं
तुम्हें दुःख होता है
लोग तुम्हें क्यों भूल गए
केवल इसलिए
तुम भूल जाओ तो
गुनाहगार नहीं
दुसरे भूल जाएँ तो
गुनाहगार
जब हिसाब बराबर
हो गया
तो फिर क्यों रोते हो

14-09-2012
733-29-09-12

Friday, September 14, 2012

मेरी यादों को मिटाने की कोशिश में



मेरी यादों को
मिटाने की कोशिश में
वो मेरे खतों को फाड़ रहे हैं
मेरी तस्वीरों को जला रहे हैं
घर के कोने कोने से
मुझसे जुडी हर चीज़ का
नाम-ओ-निशाँ मिटा रहे हैं
चाहे कितनी भी नफरत
कर लें मुझसे
मेरे साथ बिताए लम्हों को
कैसे मिटायेंगे
दिल में ज़ज्ब मेरी सूरत को
कैसे हटायेंगे
14-09-2012
732-28-09-12

Thursday, September 13, 2012

चाहूँ तो भी



चाहूँ तो भी
उनके सिवाय किसी को
याद करने का मन
नहीं करता
क्या था उनमें जो
बाकी सब को मुझ से
दूर रखता
ना तो मुझे अब तक
पता चला
ना ही उन्होंने
जुदा होने से पहले
बताया
शायद मजबूरियों ने
 उन्हें मेरे साथ ना
 रहने दिया
ना ही कहने दिया
वो भी  इस हद तक 
मुझे चाहती थी
उनके सिवाय कोई 
और मेरी यादों में 
नहीं आये
13-09-2012
731-27-09-12
याद,मोहब्बत,चाहत

कभी कोई बुलाने पर भी नहीं आता



कैसी विडंबना है
कभी कोई बुलाने पर भी
नहीं आता
कभी बिना बुलाये भी
घर लोगों से भर जाता है
जब मन की संतुष्टी के लिए
एक साथ ही बहुत होता
वो भीड़ में भी नहीं मिलता
 इंसान
खुद को अकेला समझता
निरंतर
मन के अनुरूप साथ की
तलाश में भटकता रहता
सदा असंतुष्ट रहता
13-09-2012
730-26-09-12


Friday, September 7, 2012

फूल मुरझा चुका था



फूल
मुरझा चुका था
पंखुड़ियां बिखर चुकी थी
महक हवा में मिल
चुकी थी
कभी होता था हार
गले का
अब धरती चूम रहा था
निरंतर पैरों तले रौंदा
जा रहा था
नावाकिफ था इंसान की
फितरत से
अपनों तक को नहीं
बख्शता
फिर उस को  कैसे
बख्शता
07-09-2012
729-25-09-12

ना जाने क्यों लोग मन को मारते हैं


ना जाने क्यों
लोग मन को मारते हैं
खुद को समेट लेते हैं
दहशत में जीते हैं
क्यों जीवन को
सहजता से नहीं लेते हैं
कुंठाओं के जाल से
मुक्त नहीं होते
सोच के
पैमाने नहीं बदलते हैं
जीवन भर
गीली लकड़ी जैसे
सुलगते रहते हैं
जलते कम
धुंआ अधिक देते हैं
खुद भी व्यथित रहते हैं
दूसरों को भी व्यथित
करते हैं
07-09-2012
728-24-09-12

उन्हें तो बरसना है,केवल बरसना है



बादलों को
किसी और बात से
क्या लेना देना
उन्हें तो बरसना है
केवल बरसना है
यह भी नहीं पता
कहाँ बरसना है
कितना बरसना है
चाहे किसी का घर ढह जाए
कोई पानी में बह जाए
पेड़ पौधे गल जाएँ
मानवीय भावनाओं से दूर
घमंड में सफलता की
ऊंचाइयां छू रहे
लोगों का भी यही हाल है
वो भी केवल
अपने लिए ही जीते हैं
उनकी भूख मिटनी चाहिए
किसी और से उन्हें
क्या मतलब
07-09-2012
727-23-09-12


अपना पेट तो मैं भी भर लेता हूँ



एक दस साल के बच्चे को
ढाबे पर
बर्तन मांजते देखा
मन दुखी हुआ
उससे पूछ लिया
तुम इतनी छोटी उम्र में
पढ़ते क्यों नहीं
काम क्यों करते हो
उसके जवाब ने मुझे
निरुत्तर कर दिया
कहने लगा
बाबूजी आपने पढ़ कर
क्या पा लिया
अपना पेट भरने के सिवाय
कितने भूखों का पेट भर दिया
कितने बच्चों को स्कूल
पढने भेज दिया
केवल बातें बनाना ही
तो सीखा है
वो तो मैं भी कर लेता हूँ
अपना पेट तो मैं भी
भर लेता हूँ
07-09-2012
726-22-09-12

किस को भूलूँ ? किस को याद करूँ ?



किस को भूलूँ ?
किस को याद करूँ ?
समझ नहीं आता है
कैसे भूलूँ ,?
क्यों याद नहीं करूँ ?
तय नहीं कर पाता हूँ
किसी ने दिल को
लुभाया
जीने का अर्थ बताया
कठिनाइयों से लड़ना
सिखाया
किसी ने मन को
तड़पाया
जीवन की सच्चाई का
दर्शन कराया
कुछ ना कुछ हर
एक से पाया
कोई साथ है कोई
चला गया
अभी और भी मिलेंगे
जीवन यात्रा में साथी कई
प्रश्न फिर भी
ना सुलझ पायेगा
सदा मन को कचोटेगा
किसको भूलूँ ?
किस को याद करूँ ?
समझ नहीं आता है
07-09-2012
725-21-09-12

Thursday, September 6, 2012

घमंड


नीलगिरी के
लम्बे ऊंचे पेड़
आसमान को छूने की
कोशिश में
घमंड में सीना ताने
खड़े रहते हैं
उसके आस पास लगे
छोटे पौधों की तरफ
झांकते तक नहीं
कोई राहगीर उनकी
छाया में बैठता नहीं
ना तो वो
आसमान को छू पाते
ना ही उन्हें किसी की
दुआ मिलती
06-09-2012
724-20-09-12

जो मिल गया उसकी कद्र नहीं


जो मिल गया
उसकी कद्र नहीं
जो नहीं मिला
निरंतर उसके सपने
देखता इंसान
देखे जो भी सपने पहले
पूरे हो जाते तो 
 भूल जाता इंसान
नयी इच्छाएं संजोने
लगता
नए सपने देखने लगता
भूल जाता
कभी रुकता नहीं
इच्छाओं का संसार
जो फंस गया
इच्छाओं के चक्रव्यूह में
फिर निकल नहीं पाता
कभी बाहर
जीना भूल जाता
बेचैनी मोल लेता
उलझ कर रह जाता
उसका संसार
जितनी
ज़ल्दी मुक्ती पालो
इच्छाओं से
जीवन उतना ही
साकार उसका
साकार
06-09-2012
723-19-09-12

Monday, September 3, 2012

ह्रदय के द्वार पर




मेरी जिम्मेदारियां
मजबूरियां,
मुझे कर्तव्य पथ से
भटकने नहीं देती
मेरी भावनाओं को
नियंत्रण में रखती
ह्रदय के द्वार पर खड़े
चाहने वालों के लिए
चाहते हुए भी
द्वार नहीं खोलने देती
द्वार के बाहर खड़े
चाहने वालों की पुकार
निरंतर
कानों में गूंजती रहती
दौड़ कर बार बार
द्वार तक पहुंचता हूँ
पर कर्तव्य का ध्यान आते ही
कदम पीछे लौटा देता हूँ
जानता हूँ
जीवन में कभी किसी को
वह सब नहीं मिलता
जो उसने चाहा
इच्छाएं,आकांशाएं
सर उठाती रहती
ज्वार भाटे सी आती जाती
उनपर नियंत्रण
व् सही दिशा देना भी
उतना ही आवश्यक है
संयम से काम लेता हूँ
मन को समझाता हूँ
खुशी से तय करता हूँ
ह्रदय का द्वार बंद ही रखूँ
कहीं ऐसा ना हो
जो ह्रदय के कुनबे में बसे हैं
मेरे अपने हैं
अपने आप को पराया
समझने लगे
उनके प्रति
असीम प्यार और मोह
मेरे क़दमों का संतुलन
बनाए रखते हैं
मुझे लडखडाने नहीं देते
यह पता होते भी
मेरे चाहने वालों के
ह्रदय को ठेस पहुंचेगी
पर अगर वे ह्रदय से
मुझे चाहते हैं
तो मेरी जिम्मेदारियों
मजबूरियों और कर्तव्य को
समझ कर मुझे क्षमा करेंगे
मूक रह कर मुझे पहले से
अधिक चाहते रहेंगे
मुझे पथ से नहीं भटकने देंगे
मैं उनके मन में
वो मेरे मन में बसे रहेंगे
03-09-2012
722-18-09-12


हम भी काँटों से घिरे हुए हैं



गुलाब  की तरह
हम भी
काँटों से घिरे हुए हैं
ज़हन में
नफरत के कांटे बसाए लोग
सुकून की पंखुड़ियों को
बार बार  छेदने की
कोशिश में लगे रहते
 पर हम गुलाब जितने
किस्मत वाले नहीं
बार बार
हैरान तो होते हैं 
मगर  गुलाब से
मुस्काराना  सीखा
 वो हमें रोने नहीं देता
हम हालात को खुशी से
बर्दाश्त करते रहते
मुस्काराहट को चेहरे से
जाने ना  देते
03-09-2012
721-17-09-12


काश मन की बात आँखें जान लेती



दिल क्या कहता है
मन को पता चल जाता
मन क्या सोचता है
आँखों को खबर नहीं होती
वो वही देखती रहतीं  
जो उसे दिखाई देता
जो नहीं चाहती वो भी
देखना पड़ता
काश मन की बात
आँखें जान लेती
सुकून की
इन्तहा हो जाती
किसी और चीज़ की
ज़रुरत ना होती
03-09-2012
720-16-09-12

सूरज ने बंद कर लिए दरवाज़े घर के



सूरज ने बंद कर लिए
दरवाज़े घर के
छुपा लिया उजाले को
घर के अन्दर
काला अन्धेरा
छा गया आकाश में
इंद्र ने मौक़ा ताड़ा
भेज दिए बादल घनघोर
उमड़ घुमड़ कर बरसने लगे
बहा दिए नदी नाले
किसानों के चेहरे चमकने लगे
अग्नी भी चुप नहीं रही
लगी आकाश में बिजली चमकाने
वरुण ने भेज दी ठंडी हवाएं
कर दिया वातावरण को ठंडा
पक्षी नीड़ों में छुप गए
मिट्टी महकने लगी
बच्चे मस्ती में नाहने लगे
वर्षा के गीत गाने लगे
बारिश बारिश आयी
सबके चेहरे पर खुशियाँ लाई
03-09-2012
719-15-09-12

अब कोई मुझे मनहूस ना समझे


बरसात की बूँदें
जब कमरे की खिड़की पर
टप टप कर दस्तक देती हैं
ख्याल में डूब जाता हूँ
कभी खुदा भी
मेरी किस्मत पर
रहम की बरसात कर
ऐसी ही आवाज़ से
सारी दुनिया को बता दे
मेरी बदकिस्मती ख़त्म
हो गयी है
अब कोई मुझे मनहूस
ना समझे
03-09-2012
718-14-09-12

Sunday, September 2, 2012

बड़ी विडंबना है



बड़ी विडंबना है
लोग तीर कमान
पकड़ना भी नहीं जानते
खुद को माहिर तीरंदाज़
कहते हैं
सहारे बिना चल भी
नहीं पाते
अनुभव की बात करते हैं
खुद को पहचानते नहीं
दुनिया को पहचानने का
दावा करते हैं
बातें करने में उस्ताद
कुछ करने के नाम पर
निकम्मा साबित होते हैं
फिर भी कभी सुधरने का
नाम तक नहीं लेते
02-09-2012
717-14-09-12

लोग कहते मुझ को



लोग कहते मुझ को
अपने वर्षों के अनुभव से
लोगों को समझाया करो
जब भी समझाने की
कोशिश करता हूँ
लोग मुझे ही
समझाने लगते हैं
खुद को समझदार
मुझे बेवकूफ बताने
लगते हैं
अब लगने लगा है
ज़िन्दगी भर
बेवकूफों के साथ जीता रहा
बेवकूफियां करता रहा
उम्र के इस पड़ाव पर
समझदार लोगों से
पहली बार पाला पडा
02-09-2012
716-13-09-12