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Wednesday, March 14, 2012

जीवन को नीरस ना बनाओ

जीवन  को
नीरस ना  बनाओ
नीरस
जीवन वैसा ही होता     
जैसे बिना मुस्कान
के होंठ
बिना रौशनी के नयन
बिना स्नेह के दिल
बिना हरीतिमा के पृथ्वी
बिना पंछी के गगन
बिना वात्सल्य के माँ
बिना चाँद तारों के रात
बिना भावनाओं के इंसान
बिना स्पंदन के शरीर
जीवन को नीरस ना
बनाओ
उसे जल की बहती
धारा सा बनाओ
जो निरंतर चलता रहे
हर स्थिती परिस्थिती में
आगे बढ़ता रहे
उस मैं रस डालो
होठों की मुस्कान से
प्यार के भण्डार से
आनंद और उत्साह से
छोड़ दो यादें भूत की 
ना करो चिंता भविष्य की
जीवन मैं डालो
झरनों की कल कल
पक्षियों की चचहाहट
बसंत की बहार   
संगीत के सुर,माँ की
ममता
आमोद प्रमोद से उसे
सजाओ
भाई चारे से निभाओ
खूब हँसो और हँसाओ
नाचो और नचाओ
जीओ और जिलाओ
जीवन को नीरस ना
बनाओ
14-03-2012
367-101-03-12