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Thursday, March 21, 2013

तुमने समझा जीवन एक नर्म बिछोना है



जीवन के
दुर्गम पथ पर
चलता रहा
ठोकर खा कर
गिरता रहा
उठ कर फिर
चलता रहा
सदा हँसता रहा
तुम थोड़ा सा
चल कर थक गए
ठोकर खा कर बैठ गए
बिना दुःख के रोते रहे
तुमने समझा
जीवन एक नर्म
बिछोना है
मैंने समझा
जीवन लक्ष्य है
निरंतर चलते रहना
कर्तव्य है
39-39-21-01-2013
जीवन,लक्ष्य, कर्तव्य
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर