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Sunday, April 14, 2013

अकेला चला था



अकेला चला था
ज़िन्दगी के सफ़र में
लोग मिलते रहे रास्ते में
काफिला बनता गया
हकीकत से बेखबर था
सोचा था काफिला चलेगा
मंजिल पर पहुँचने तक
काफिला बिखरता गया
हर शख्श साथ छोड़ता  गया
जहाँ से चला था
फिर वहीँ पहुँच गया
अकेला चलना शुरू किया था
आज फिर अकेला रह गया
21-77-14-02-2013 
ज़िन्दगी, काफिला, अकेला
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर